Friday, June 9, 2023

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥


    जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी कि रावण की लंका हनुमान जी नें नहीं, बल्कि पांच लोगों ने मिलकर जलाई थी। विद्वानों के अनुसार रामचरित मानस में इस बात का उल्लेख हैं कि लंका केवल हनुमान जी ने नहीं, बल्कि पांच लोगों ने मिलकर जलाई थी।


🔥लंका दहन के बाद जब हनुमान जी वापस श्रीराम के पास पहुंचे तो उन्होंने पूछा मैंने तो आपको सीता की कुशलक्षेम लेने भेजा था। आपने तो लंका ही जला डाली। तब परम बुद्धिमान हनुमान जी ने भगवान राम को उत्तर देते हुए कहा। महाराज लंका मैंने नहीं बल्कि "आपको मिलाकर " पांच लोगों ने जलाई है। आश्चर्य से भगवान राम ने पूछा कैसे और किन पांच लोगों ने लंका जलाई और मैं कैसे शामिल हूं।


इन पांच ने जलाई लंका🔥


हनुमान जी ने कहा कि प्रभु लंका जलाई १. आपने, २. रावण के पाप ने, ३. सीता के संताप ने, ४. विभीषण के जाप ने और ५. मेरे पिता वायु देव ने। जब श्री राम ने इस में पूछा कि यह कैसे तो हनुमान जी ने इसका जो उत्तर दिया वह आप भी पढि़ए कैसे-


1- 🔥लंका जलाई आपने : - हनुमान जी ने कहा भगवान सभी को पता है कि बिना आपकी मर्जी के पत्ता तक नहीं हिल सकता है ,फिर लंका दहन तो बहुत बड़ी बात है। 

हनुमान जी ने कहा कि जब मैं अशोक वाटिका में छिपकर सीता माता से मिलना चाह रहा था, वहां राक्षसियों का झुंड था। जिनमें एक आपकी भक्त त्रिजटा भी थी। उसने मुझे संकेत दिया था कि आपने मेरे जरिए पहले से ही लंका दहन की तैयारी कर रखी है। इसे तुलसीदास ने भी रचित रामचरित मानस में लिखा है कि जब हनुमान पेड़ पर बैठे थे, त्रिजटा राक्षसियों से कह रही थी-


सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना

सीतहि सेई करौ हित अपना।

सपने बानर लंका जारी,

जातुधान सेना सब मारी।

यह सपना मैं कहौं पुकारी

होइहि सत्य गये दिन चारी।


2- 🔥रावण के पाप ने : - हनुमान जी ने कहा हे प्रभु भला मैं कैसे लंका जला सकता हूं। उसके लिए तो रावण खुद ही जिम्मेदार है। क्योंकि वेदों में लिखा है, जिस शरीर के द्वारा या फिर जिस नगरी में लोभ, वासना, क्रोध, पाप बढ़ जाता है, उसका विनाश सुनिश्चित है। तुलसीदास लिखते हैं कि हनुमान जी रावण से कह रहे हैं-


सुनु दसकंठ कहऊं पन रोपी,

बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।

संकर सहस बिष्नु अज तोही,

सकहिं न राखि राम कर द्रोही।


3- 🔥सीता के संताप ने : - हनुमान जी ने श्रीराम से कहाए प्रभु रावण की लंका जलाने के लिए सीता माता की भूमिका भी अहम है। जहां पर सती-सावित्री महिला पर अत्याचार होते हैं, उस देश का विनाश सुनिश्चित है। सीता माता के संताप यानी दुख की वजह से लंका दहन हुआ है। सीता के दुख के बारे में रामचरित मानस में लिखा है-


कृस तनु सीस जटा एक बेनी,

जपति ह्रदय रघुपति गुन श्रेनी।

निज पद नयन दिएं मन रामम पद कमल लीन

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।


4-🔥 लंका जलाई विभीषण के जाप ने : - हनुमान जी ने कहा कि हे राम! यह सर्वविदित है कि आप हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। और विभीषण आपके परम भक्त थे। वह लंका में राक्षसों के बीच रहकर राम का नाम जपते थे। उनका जाप भी एक बड़ी वजह है लंका दहन के लिए। रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने लिखा है कि लंका में विभाषण जी का रहन-सहन कैसा था-


रामायुध अंकित गृह शोभा बरनि न जाई

नव तुलसिका बृंद तहं देखि हरषि कपिराई।


5- 🔥लंका जलाई मेरे पिता ने : - हनुमान जी ने कहा भगवन लंका जलाने वाले पांचवें सदस्य मेरे पिता जी पवन देव हैं, क्योंकि जब मेरी पूंछ से एक घर में आग लगी थी तो मेरे पिता ने भी हवाओं को छोड़ दिया था। जिससे लंका में हर तरफ आग लग गई।


तुलसीदास जी ने लिखा है-


हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास

अट्टहास करि गरजा पुनि बढि लाग अकास।


          🙏#जय_श्री_राम 🙏

Saturday, May 13, 2023

महाबली हनुमान

  

  "महाबली हनुमान"


           सुग्रीव, बाली दोनों ब्रह्मा के औरस (वरदान द्वारा प्राप्त) पुत्र हैं, और ब्रह्माजी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है। जब बाली को ब्रह्माजी से ये वरदान प्राप्त हुआ कि जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी, और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा। 
           बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था। उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी। रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड की कोई सीमा न रही। अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था। और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई।
          अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था। हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था। अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था। एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था। और बार-बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- "है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो। है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो, जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे।" इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था।
           संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी! राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे। बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा, और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- "हे वीरों के वीर ! हे ब्रह्म अंश ! हे राजकुमार बाली ! (तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शान्त जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो, हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो, फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो, अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो। इससे तुम्हे क्या मिलेगा। तुम्हारे औरस पिता ब्रह्माके वरदान स्वरूप कोई तुम्हें युद्ध मे नही हरा सकता। क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा। उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी। इसलिए हे कपि राजकुमार ! अपने बल के घमण्ड को शान्त कर, और राम नाम का जाप कर। इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा। और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जायेंगे।"
         इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- "ऐ तुच्छ वानर ! तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को, जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है, और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड-खंड हो जाता है। जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम की, और जिस राम की तू बात कर रहा है, वो है कौन ? केवल तू ही जानता है राम के बारे में, मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना, और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है।"
        हनुमान जी ने कहा- "प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी हैं। उनकी महिमा अपरम्पार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाय।" बाली बोला- "इतना ही महान है राम तो बुला जरा, मैं भी तो देखूँ कितना बल है उसकी भुजाओं में।" बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे।
        हनुमानजी ने कहा- "ए बल के मद में चूर बाली ! तू क्या प्रभु राम को युद्ध में हराएगा। पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा।" बाली बोला- "तब ठीक है कल-के-कल नगर के बीचों-बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा।" हनुमान जी ने बाली की बात मान ली। बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा।
          अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे। तभी उनके सामने ब्रह्माजी प्रकट हुए। हनुमान जी ने ब्रह्माजी को प्रणाम किया और बोले- "हे जगत पिता ! आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा।" ब्रह्माजी बोले- "हे अंजनीसुत ! हे शिवांश ! हे पवनपुत्र ! हे राम भक्त हनुमान ! मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दण्डता के लिए क्षमा कर दो,और युद्ध के लिए न जाओ।" ऐसी ही रोचक और ज्ञानवर्धक कथाओं को पढ़ने के लिये हमारे फेसबुक पेज–'श्रीजी की चरण सेवा' के साथ जुड़े रहें। हनुमान जी ने कहा- "हे प्रभु ! बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता, परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता। बाली ने मुझे युद्ध के लिए चुनौती दी है, जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा। अन्यथा सारी विश्व में ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है।" तब कुछ सोच कर ब्रह्माजी ने कहा- "ठीक है हनुमान जी, पर आप अपने साथ अपनी समस्त शक्तियों को साथ न लेकर जायें, केवल दसवां भाग का बल लेकर जायें। बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दें तथा युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें।" हनुमान जी ने ब्रह्माजी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकल गये।

         बाली नगर के बीच में एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था। और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार-बार हनुमान जी को ललकार रहा था। पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था। हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे। बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा। ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पाँव अखाड़े में रखा, उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई। बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई, बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे। उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया, बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा। उसका शरीर फट कर खून निकलने लगा। बाली को कुछ समझ नही आ रहा था।

         तभी ब्रह्माजी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- "पुत्र ! जितना जल्दी हो सके यहाँ से दूर अति दूर चले जाओ।" बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा, उसने ब्रह्माजी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दी। सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया। कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रह्माजी को देख कर बोला- "ये सब क्या है, हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना, फिर आपका वहाँ अचानक आना और ये कहना कि वहाँ से जितना दूर हो सके चले जाओ, मुझे कुछ समझ नही आया ?" ब्रह्माजी बोले- "पुत्र ! जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तुममें समा गया, तब तुम्हें कैसा लगा।" बाली बोला- "मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रहा है। ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार में मेरे तेज का सामना कोई नही कर सकता। पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा।" 
          ब्रह्माजो बोले- "हे बाली ! मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा। पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके। सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वे तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते।" 
         इतना सुन कर बाली पसीना-पसीना हो गया। और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु ! यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियाँ हैं तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे।
          ब्रह्माजी ने कहा- "हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पायेंगे। क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती।" ये सुन कर बाली ने वही से हनुमान जी को दण्डवत प्रणाम किया और बोला। "जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शान्त और रामभजन गाते रहते हैं और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था। मुझे क्षमा करें।" आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया।


                                 "जय श्री राम"

Tuesday, May 2, 2023

कर्म और भाग्य

 🙏कर्म और भाग्य🙏

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा सभा बुलाकर प्रश्न किया कि

“मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , 

किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने

जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों

 इसका क्या कारण है ?

राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर होगये ..क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं ।

सब सोच में पड़गये । कि अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले महाराज की जय हो ! 

आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है , आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो 

वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है ।

राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं ,

 सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा 

“तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है मैं भूख से पीड़ित हूँ ।

तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, 

पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, 

वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे

राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ”

 मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है ,

 आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,

जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है ”

सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, 

उत्सुकता प्रबल थी कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ वहाँ भी जाकर देखता हूँ क्या होता है ।

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा 

जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया ।

राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुनो लो –

तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों

भाई व राजकुमार थे

एकबार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।

अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली जैसे तैसे हमने चार बाटी सेकीं और अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये ।

 अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –

“बेटा मैं दस दिन से भूखा हूँ अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो ,

 मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय, इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी ”

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले “तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ?

 चलो भागो यहां से ….।

वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही 

किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा

भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये ,

 मुझे भी बाटी मांगी… तथा दया करने को कहा किन्तु 

मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि  चलो

आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ

बालक बोला “अंतिम आशा लिये वो महात्मा हे राजन !

आपके पास आये , आपसे भी दया की याचना की

 सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदरसहित उन महात्मा को दे दी

बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले “

तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा ”

बालक ने कहा “इस प्रकार हे राजन ! 

उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे

 हैं ,

धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं ” ..।

इतना कहकर वह बालक मर गया ।

जो असंख्य जीवो के लिए दुर्लभ है

वह मनुष्य जन्म हमें दिया

जहाँ असंख्य जीवो को कूड़ा ढूंढने पर भी भोजन नहीं मिलता

हमे ईश्वर ने धन्यवान कुल में जन्म दिया

ईश्वर ने हमपे भरोसा किया कि हम सब जीवो को

सुख देंगे इसी लिए ईश्वर ने हमे यह सब कुछ दिया

अब भरोसे पर खरा उतरने की बारी हमारी है...

श्री हनुमान जी के अवतार

श्री हनुमान जी के अवतार

🚩जानें किस मूर्ति से कौन सी मनोकामना होती है पूरी।

🍁1. पूर्वमुखी हुनमान जी - पूर्व की ओर मुख वाले बजरंबली को वानर रूप में पूजा जाता है। इस रूप में भगवान को बेहद शक्तिशाली और करोड़ों सूर्य के तेज के समान बताया गया है। शत्रुओं के नाश के बजरंगबली जाने जाते हैं। दुश्मन अगर आप पर हावी हो रहे हैं तो पूर्वमुखी हनुमान की पूजा शुरू कर दें।

🍁2. पश्चिममुखी हनुमान जी - पश्चिम की ओर मुख वाले हनुमानजी को गरूड़ का रूप माना जाता है। इसी रूप को संकटमोचन का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ अमर है उसी के समान बजरंगबली भी अमर हैं। यही कारण है कि कलयुग के जाग्रत देवताओं में बजरंगबली को माना जाता है।

🍁3. उत्तरामुखी हनुमान जी - उत्तर दिशा की ओर मुख वाले हनुमान जी की पूजा शूकर के रूप में होती है। एक बात और वह यह कि उत्तर दिशा यानी ईशान कोण देवताओं की दिशा होती है। यानी शुभ और मंगलकारी। इस दिशा में स्थापित बजरंगबली की पूजा से इंसान की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। इस ओर मुख किए भगवान की पूजा आपको धन-दौलत, ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा, लंबी आयु के साथ ही रोग मुक्त बनाती है।

🍁4. दक्षिणामुखी हनुमान जी - दक्षिणमुखी हनुमान जी को भगवान नृसिंह का रूप माना जाता है। दक्षिण दिशा यमराज की होती है और इस दिशा में हनुमान जी की पूजा से इंसान के डर, चिंता और कठिनाईयों से मुक्ति मिलती है। दक्षिणमुखी हनुमान जी बुरी शक्तियों से बचाते हैं।

🍁5.ऊर्ध्वमुख - इस ओर मुख किए हनुमान जी को ऊर्ध्वमुख रूप यानी घोड़े का रूप माना गया है। इस स्वरूप की पूजा करने वालों को दुश्मनों और संकटों से मुक्ति मिलती है। इस स्वरूप को भगवान ने ब्रह्माजी के कहने पर धारण कर हयग्रीव दैत्य का संहार किया था।

🍁6. पंचमुखी हनुमान - पंचमुखी हनुमान के पांच रूपों की पूजा की जाती है। इसमें हर मुख अलग-अलग शक्तियों का परिचायक है। रावण ने जब छल से राम लक्ष्मण को बंधक बना लिया था तो हनुमान जी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण कर अहिरावण से उन्हें मुक्त कराया था। पांच दीये एक साथ बुझाने पर ही श्रीराम-लक्षमण मुक्त हो सकते थे इसलिए भगवान ने पंचमुखी रूप धारण किया था। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख में वह विराजे हैं।

🍁7. एकादशी हनुमान - ये रूप भगवान शिव का स्वरूप भी माना जाता है। एकादशी रूप रुद्र यानी शिव का 11वां अवतार है। ग्यारह मुख वाले कालकारमुख के राक्षस का वध करने के लिए भगवान ने एकादश मुख का रुप धारण किया था। चैत्र पूर्णिमा यानी हनुमान जयंती के दिन उस राक्षस का वध किया था। यही कारण है कि भक्तों को एकादशी और पंचमुखी हनुमान जी पूजा सारे ही भगवानों की उपासना समान माना जाता है।

🍁8. वीर हनुमान - हनुमान जी के इस स्वरूप की पूजा भक्त साहस और आत्मविश्वास पाने के लिए करते हें। इस रूप के द्वारा भगवान के बल, साहस, पराक्रम को जाना जाता है अर्थात तो भगवान श्रीराम के काज को संवार सकता है वह अपने भक्तों के काज और कष्ट क्षण में दूर कर देते हैं।

🍁9. भक्त हनुमान - भगवान का यह स्वरूप श्री रामभक्त का है। इनकी पूजा करने से आपको भगवान श्रीराम का भी आर्शीवाद मिलता है। बजरंगबली की पूजा अड़चनों को दूर करने वाली होती है। इस पूजा से भक्तों में एकाग्रता और भक्ति की भावना जागृत होती है।

🍁10. दास हनुमान - बजरंबली का यह स्वरूप श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति को दिखाता है। इस स्वरूप की पूजा करने वाले भक्तों को धर्म कार्य और रिश्ते-नाते निभाने में निपुणता हासिल होती है। सेवा और समर्पण का भाव भक्त इस स्वरूप के द्वारा ही पाते हैं।

🍁11. सूर्यमुखी हनुमान - यह स्वरूप भगवान सूर्य का माना गया है। सूर्य देव बजरंगबली के गुरु माने गए हैं। इस स्वरूप की पूजा से ज्ञान, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और उन्नति का रास्ता खुलता है। क्योंकि श्री हनुमान के गुरु सूर्यदेव अपनी इन्हीं शक्तियों के लिए जाने जाते हैं।

#श्री राम जय राम जय जय राम#

 #ॐ हनुमते दुःखभंजन,#अंजनिसुत केसरीनंदन#  #रामदूत संकटमोचन,# 

!! जय श्री राम!!

ईश्वर का अस्तित्व तुम्हें साकार नजर आ जाएगा।

श्रद्धा से नतमस्तक हो आधार नजर आ जाएगा।।

!! जय श्री राम !!


Sunday, April 30, 2023

ब्रह्मगिरीपर्वत का रहस्य

 "ब्रह्मगिरीपर्वत"

          वराहपुराण में और पद्मपुराण में ऐसा लिखा है कि पहले ब्रह्मा जी ने 60 हजार वर्ष तक तप किया फिर भी गोपियों की रज नहीं मिली। उसके बाद सतयुग के अन्त में ब्रह्मा जी ने फिर तप किया भगवान ने कहा, कि तुम क्या चाहते हो ? 

          ब्रह्मा जी बोले, कि सब गोपियों की रज मिल जाये व माधुर्यमयी लीलाएँ देखने को मिले। 

          भगवान ने कहा, कि वहाँ पुरुषों का प्रवेश नहीं है। 

          ब्रह्मा जी बोले, फिर ? 

          भगवान ने कहा, कि तुम पर्वत बन जाओ। 

          ब्रह्मा जी बोले, कहाँ ? 

          भगवान ने कहा,  कि तुम ब्रज में चले जाओ। 

          ब्रह्मा जी ने कहा, कि ब्रज तो बहुत बड़ा है, कहाँ जायें ? 

          भगवान बोले, कि वृषभानुपुर यानि बरसाना चले जाओ। वहाँ पर्वत बन जाना, अपने आप सब लीला मिल जायेगी व गोपियों की चरण रज भी मिल जायेगी। बरसाना वहाँ नित्य श्री राधा रानी के चरण मिलेंगे। 

          तब ब्रह्मा जी यहाँ आकर पर्वत बन गए। 

          एक कथा आती है बरसाने के पर्वतों के बारे में कि जब भगवान सती अनुसुइया की परीक्षा लेने गये थे तो वहाँ उसने ब्रह्मा विष्णु शिव को श्राप दिया कि तुमने बड़ा अमर्यादित व्यवहार किया है इसीलिए जाओ पर्वत बन जाओ। तो तीनों देवता पर्वत बन गये और उनका नाम त्रिंग हुआ। 

          जब श्री राम जी का सेतु बंधन हो रहा था तो पर्वत लाये जा रहे थे। त्रिंग को जब हनुमान जी ला रहे थे तो आकाशवाणी हुई कि अब पर्वत मत लाओ क्योंकि सेतु बंधन हो चुका है। तो जब हनुमान जी ने उसे यहाँ पर रख दिया तो गिरिराज जी बोले कि हनुमान जी हम तुमको श्राप दे देंगे। हे वानर राज तुमने हमारा प्रभु से मिलन नहीं होने दिया। तो हनुमान जी ने प्रभु से प्रार्थना की। तब राम जी ने कहा कि मैं स्वयं श्री कृष्ण के रूप में उनको अपने हाथों से धारण करूँगा जब की औरों को तो सिर्फ चरण स्पर्श ही दूँगा। 

          एक पुराण में लिखा है कि स्वयं राम जी आये और उन्होंने जो त्रिंग थे, ब्रह्मा विष्णु शिव, इन तीनों को अलग-अलग करके यहाँ स्थापित किया। ‘नन्दगाँव’ में शिव जी को स्थापित किया, ’नन्दीश्वर‘ के रूप में, और ‘गोवर्धन‘ में विष्णु को ‘गिरिराज’ जी के रूप में, ब्रह्मा जी यहाँ ‘बरसाने’ में स्थापित किये ‘ब्रह्मगिरी पर्वत‘ के रूप में। ब्रह्मगिरी के चार शिखर हैं, चार गढ़ है, मानगढ़, दानगढ़, भानुगढ़, विलासगढ़। ये जितने शिखर हैं ये ब्रह्मा जी के मस्तक हैं।

                             "जय जय श्री राधे"


Friday, April 21, 2023

माता शबरी की प्रतीक्षा

 शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।


शबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी।


महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया "पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।"


अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा- कब आएंगे..?


महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे। महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया।


 आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए।ये उलट कैसे हुआ। गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ???


महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका।

महर्षि मतंग बोले- 

पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ।

अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ।

उनका कौशल्या से विवाह होगा।फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। 

फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा।फिर प्रतीक्षा..


फिर उनका विवाह कैकई से होगा।फिर प्रतीक्षा.. 


फिर वो जन्म लेंगे, फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा।फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा। तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे।तुम उन्हें कहना आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।


शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।


वह फिर अधीर होकर पूछने लगी- "इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव???"


महर्षि मतंग बोले- "वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे।यह भावी निश्चित है। लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे "अवश्य"...!


जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे। इसलिए प्रतीक्षा करना।वे कभी भी आ सकते है। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।"


शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी।वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। 


हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती।


कभी भी आ सकतें हैं।

हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा। शबरी बूढ़ी हो गई।लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही।


और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी।


गुरु का कथन सत्य हुआ।भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।


ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो। एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे-


"कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..?"


राम मुस्कुराए- "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..?"


"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।


राम ने कहा- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है।”


"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।


”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...!” (वानरी भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। ”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...।" (मार्जारी भाव)


राम मुस्कुराकर रह गए!!


भीलनी ने पुनः कहा- "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं!" तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..?”


राम गम्भीर हुए और कहा-


भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने आया है..?”


रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है।


राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।”


"जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"


राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि "शासन/प्रशासन और सत्ता" जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है।”

(अंत्योदय)


राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!


माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।


राम ने फिर कहा-


राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।”


"राम राजमहल से निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।”


"राम निकला है, ताकि “भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए।”


और


"राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है।”


शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा-  "बेर खाओगे राम..?”


राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"


शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये।


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु..?” 


"यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”


सबरी मुस्कुराईं, बोली-   "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"


मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन!

🙏🏻💐 #जय_श्री_राम💐🙏

🚩🙏#सनातन_धर्म_सर्वश्रेष्ठ_है 🚩🙏

Tuesday, April 18, 2023

“रामायण” क्या है?

 “रामायण” क्या है?

अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना.......

रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊

एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। 

नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ?

मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।

माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया |

श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं

माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ? 

क्या नींद नहीं आ रही ?

शत्रुघ्न कहाँ है ?

श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, 

गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।

उफ ! 

कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।

तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए । 

आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, 

माँ चली ।

आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?

अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !! 

माँ सिराहने बैठ गईं, 

बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं, 

माँ !

उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? 

मुझे बुलवा लिया होता ।

माँ ने कहा, 

शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"

शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, 

भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?

माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।

देखो क्या है ये रामकथा...

यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!!

यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा...  चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।

"रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।

भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!!

परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! 

माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. 

परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, 

परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.??

क्या बोलूँगा उनसे.?

यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- 

"आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"

लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!!

परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!!

वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!!

लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!!

वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!!

मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!!

तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।

यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!!

माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!!

मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!!

माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?

क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?

हनुमान जी पूछते हैं- देवी! 

आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। 

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा.!!

उर्मिला बोलीं- "

मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता.!!

रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता.!!

आपने कहा कि, प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं..!

जो “योगेश्वर प्रभु श्री राम” की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता..!!

यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं..

मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं..

उन्होंने न सोने का प्रण लिया था..इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं..और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया...वे उठ जायेंगे..!!

और “शक्ति” मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है.!!

मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा.!!

इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ..सूर्य उदित नहीं होगा।"

राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं... 

कभी “सीता” तो कभी “उर्मिला”..!!

 भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया ..परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया .!!

जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है... 

कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा .,जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा .!!

"लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो,

स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो.. 

नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो, 

चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो..

हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो, 

लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो.. 

श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो, 

हनुमत के जैसी निष्ठा और शक्ति हो... "

ये रामायण है, पुण्य कथा श्री राम की।

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Wednesday, April 12, 2023

भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ- Devotional Story

भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ

जगन्नाथ पूरी में माधव दास नाम के एक भक्त रहा करते थे। माधव दास जी सांसारिक मोह माया से दूर रहते और केवल भगवान जगन्नाथ के भजन व दर्शन किया करते थे। माधव दास जी भगवान जगन्नाथ को अपना मित्र मानते थे और वे हमेशा जगन्नाथ जी से बाते करते,  उनके साथ खेलते थे। इस प्रकार माधव दास अपनी भक्ति में सदैव मस्त-मग्न रहते थे।

एक बार ऐसा समय आया जब माधव दास जी को अतिसार यानि उलटी-दस्त का रोग हो गया। जिसकी वजह से वह इतने दुर्बल हो गए कि उनसे उठा-बैठा जाना भी नहीं हो रहा था। उनकी इस हालत को देखकर आस-पास के लोग उनकी सेवा करने को आते लेकिन माधव दास उनसे कह देते कि मेरे तो एक जगन्नाथ ही हैं, वही मेरी रक्षा करेंगे। ऐसा करते-करते जब रोग बहुत बढ़ गया तब भगवान से भी अपने भक्त की हालत देखी नही गई और वे स्वंय सेवक बनकर उनके घर पहुंचे और माधव दास से कहने लगे क्या हम आपकी सेवा कर दें। क्योंकि माधव दास का रोग इतना बढ़ गया था कि उनको पता भी नही रहता, वे कब मल-मूत्र त्याग देते थे और वैसे ही वस्त्र गंदे पड़े रहते। अपने भक्त की यह दशा भगवान से देखी नहीं गई और वे स्वंय माधव दास के वस्त्रों को अपने हाथों से साफ करते, उसके पश्चात भगवान माधव दास के पूरे शरीर को साफ किया करते, उनको स्वच्छ रखते थे। कुछ समय बाद जब माधवदास की चेतना वापिस आई तो वे तुरंत ही भगवान जगन्नाथ जी को पहचान गए और कहने लगे मेरे प्रभु मेरी रक्षा के लिए स्वंय आ गए।


माधव दास ने भगवान से पूछा- प्रभु, आप तो त्रिभुवन के स्वामी हो, तो फिर आप मेरी सेवा क्यों कर रहे हो। यदि आप चाहे तो मेरे रोग को पल मे ही दूर कर सकते हैं, तो प्रभु यह सब आपको नही करना पड़ता।

भगवान कहते हैं- हे माधव, मुझसे मेरे प्यारे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता, इसलिए मैनें यहां आकर तुम्हारी सेवा की और जो नियति में लिखा हो उसे भोगना तो अवश्य होता हैं, इसलिए मैंने तुम्हें ठीक नही किया, क्योंकि यदि इस रोग को मैं अभी ठीक कर देता तो तुम्हें यह भोगना के लिए पुन: जन्म लेना होता और मैं नहीं चाहता की मेरे भक्त को एक प्रारब्ध के कारण पुनः जन्म लेना पड़े। लेकिन यदि फिर भी तुम कहते हो तो मैं अपने भक्त की बात नहीं टाल सकता। हे माधव, अभी तुम्हारे प्रारब्ध के 15 दिन का रोग शेष बचा है, इसलिए अब यह 15 दिन का रोग मैं तुमसे ले लेता हूं। इस प्रकार भगवान ने 15 दिन के रोग को अपने ऊपर ले लिया और अपने भक्त की रक्षा करी।

तब से भगवान जगन्नाथ जी साल मैं एक बार बीमार पड़ते हैं और इसलिए हर वर्ष उन्हें स्नान कराया जाता है। 15 दिन के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। भगवान को 56 भोग नहीं खिलाया जाता, बीमार होने के कारण परहेज किया जाता हैं। इन 15 दिनों में जगन्नाथ भगवान को काढ़ा पिला़या जाता है और उनकी सेवा की जाती है। जिससे वे जल्दी ठीक हो जाएं और अपने भक्तों के दर्शन दे सके। अपने भक्तों का जीवन सुखमयी बनाने के लिए भगवान ने रोग को अपने ऊपर ले लिया, ऐसे हैं हमारे भक्तवत्सल भगवान जगन्नाथ जी. 🌹 हरि शरणम् 🌹 

🙏 जय श्री हरि , जय श्रीकृष्ण,  प्रेम से बोलो ...राधे राधे 🌷

Monday, April 10, 2023

हनुमान जी की अद्भुत भक्ति - Devotional Story

 हनुमान जी की अद्भुत भक्ति

जय श्री राम 

महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जगत को त्रास देने वाला रावण अपने कुटुंब सहित नष्ट हो चुका था। कौशलाधीश राम के नेतृत्व में चहुँओर शांति थी।

राम का राज्याभिषेक हुआ। राजा राम ने सभी वानर और राक्षस मित्रों को ससम्मान विदा किया। अंगद को विदा करते समय राम रो पड़े थे। हनुमान को विदा करने की शक्ति तो श्रीराम में भी नहीं थी। माता सीता भी उन्हें पुत्रवत मानती थीं। हनुमान अयोध्या में ही रह गए।

राम दिन भर दरबार में, शासन व्यवस्था में व्यस्त रहे। संध्या जब शासकीय कार्यों से छूट मिली तो गुरु और माताओं का कुशलक्षेम पूछ अपने कक्ष में आए। हनुमान उनके पीछे-पीछे ही थे। राम के निजी कक्ष में उनके सारे अनुज अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उपस्थित थे। वनवास, युद्ध, और फिर अंनत औपचारिकताओं के पश्चात यह प्रथम अवसर था जब पूरा परिवार एक साथ उपस्थित था। राम, सीता और लक्ष्मण को तो नहीं, कदाचित अन्य वधुओं को एक बाहरी, अर्थात हनुमान का वहाँ होना अनुचित प्रतीत हो रहा था। चूंकि शत्रुघ्न सबसे छोटे थे, अतः वे ही अपनी भाभियों और अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति हेतु संकेतों में ही हनुमान को कक्ष से जाने के लिए कह रहे थे। पर आश्चर्य की बात कि हनुमान जैसा ज्ञाता भी यह मामूली संकेत समझने में असमर्थ हो रहा था।

अस्तु, उनकी उपस्थिति में ही बहुत देर तक सारे परिवार ने जी भर कर बातें कीं। फिर भरत को ध्यान आया कि भैया-भाभी को भी एकांत मिलना चाहिए। उर्मिला को देख उनके मन में हूक उठती थी। इस पतिव्रता को भी अपने पति का सानिध्य चाहिए। अतः उन्होंने राम से आज्ञा ली, और सबको जाकर विश्राम करने की सलाह दी। सब उठे और राम-जानकी का चरणस्पर्श कर जाने को हुए। परन्तु हनुमान वहीं बैठे रहे। उन्हें देख अन्य सभी उनके उठने की प्रतीक्षा करने लगे कि सब साथ ही निकले बाहर।

राम ने मुस्कुराते हुए हनुमान से कहा, "क्यों वीर, तुम भी जाओ। तनिक विश्राम कर लो।"

हनुमान बोले, "प्रभु, आप सम्मुख हैं, इससे अधिक विश्रामदायक भला कुछ हो सकता है? मैं तो आपको छोड़कर नहीं जाने वाला।"

शत्रुघ्न तनिक झुंझलाकर बोले, "परन्तु भैया को विश्राम की आवश्यकता है कपीश्वर! उन्हें एकांत चाहिए।"

"हाँ तो मैं कौन सा प्रभु के विश्राम में बाधा डालता हूँ। मैं तो यहाँ पैताने बैठा हूँ।"

"आपने कदाचित सुना नहीं। भैया को एकांत की आवश्यकता है।"

"पर माता सीता तो यहीं हैं। वे भी तो नहीं जा रही। फिर मुझे ही क्यों निकालना चाहते हैं आप?"

"भाभी को भैया के एकांत में भी साथ रहने का अधिकार प्राप्त है। क्या उनके माथे पर आपको सिंदूर नहीं दिखता?

हनुमान आश्चर्यचकित रह गए। प्रभु श्रीराम से बोले, "प्रभु, क्या यह सिंदूर लगाने से किसी को आपके निकट रहने का अधिकार प्राप्त हो जाता है?"

राम मुस्कुराते हुए बोले, "अवश्य। यह तो सनातन प्रथा है हनुमान।"

यह सुन हनुमान तनिक मायूस होते हुए उठे और 

राम-जानकी को प्रणाम कर बाहर चले गए।

प्रातः राजा राम का दरबार लगा था। साधारण औपचारिक कार्य हो रहे थे कि नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी न्याय मांगते दरबार में उपस्थित हुए। ज्ञात हुआ कि पूरी अयोध्या में रात भर व्यापारियों के भंडारों को तोड़-तोड़ कर हनुमान उत्पात मचाते रहे थे। राम ने यह सब सुना और सैनिकों को आदेश दिया कि हुनमान को राजसभा में उपस्थित किया जाए। रामाज्ञा का पालन करने सैनिक अभी निकले भी नहीं थे कि केसरिया रंग में रंगे-पुते हनुमान अपनी चौड़ी मुस्कान और हाथी जैसी मस्त चाल से चलते हुए सभा में उपस्थित हुए। उनका पूरा शरीर सिंदूर से पटा हुआ था। एक-एक पग धरने पर उनके शरीर से एक-एक सेर सिंदूर भूमि पर गिर जाता। उनकी चाल के साथ पीछे की ओर वायु के साथ सिंदूर उड़ता रहता।

राम के निकट आकर उन्होंने प्रणाम किया। अभी तक सन्न होकर देखती सभा, एकाएक जोर से हँसने लगी। अंततः बंदर ने बंदरों वाला ही काम किया। अपनी हँसी रोकते हुए सौमित्र लक्ष्मण बोले, "यह क्या किया कपिश्रेष्ठ? यह सिंदूर से स्नान क्यों? क्या यह आप वानरों की कोई प्रथा है?"

हनुमान प्रफुल्लित स्वर में बोले, "अरे नहीं भैया। यह तो आर्यों की प्रथा है। मुझे कल ही पता चला कि अगर एक चुटकी सिंदूर लगा लो तो प्रभु राम के निकट रहने का अधिकार मिल जाता है। तो मैंने सारी अयोध्या का सिंदूर लगा लिया। क्यों प्रभु, अब तो कोई मुझे आपसे दूर नहीं कर पाएगा न?"

सारी सभा हँस रही थी। और भरत हाथ जोड़े अश्रु बहा रहे थे। यह देख शत्रुघ्न बोले, "भैया, सब हँस रहे हैं और आप रो रहे हैं? क्या हुआ?"

भरत स्वयं को सम्भालते हुए बोले, "अनुज, तुम देख नहीं रहे! वानरों का एक श्रेष्ठ नेता, वानरराज का सबसे विद्वान मंत्री, कदाचित सम्पूर्ण मानवजाति का सर्वश्रेष्ठ वीर, सभी सिद्धियों, सभी निधियों का स्वामी, वेद पारंगत, शास्त्र मर्मज्ञ यह कपिश्रेष्ठ अपना सारा गर्व, सारा ज्ञान भूल कैसे रामभक्ति में लीन है। राम की निकटता प्राप्त करने की कैसी उत्कट इच्छा, जो यह स्वयं को भूल चुका है। ऐसी भक्ति का वरदान कदाचित ब्रह्मा भी किसी को न दे पाएं। मुझ भरत को राम का अनुज मान भले कोई याद कर ले, पर इस भक्त शिरोमणि हनुमान को संसार कभी भूल नहीं पाएगा। हनुमान को बारम्बार प्रणाम।"


Friday, April 7, 2023

हनुमान जी की पंचमुखी अवतार कथा - Devotional Story

हनुमान जी श्री राम के परम भक्त हैं। बल बुद्धि के धाम है। उन्हें संकट मोचन भी कहा जाता है।

लंका युद्ध के पश्चात् जब मेघनाद मारा गया तो रावण को अपने दो भाईयों अहिरावण और महिरावण से जो कि तंत्र विद्या के महाज्ञानी थे उनकी मदद मांगी।

दोनों भाई मां कामाक्षी के परम भक्त थे। रावण ने कहा कि अपने छल कपट से दोनों भाई राम लक्ष्मण का वध कर देना। जब वह सुबेल पर्वत पर पहुंचे तो दोनों भाईयों की सुरक्षा बहुत कड़ी थी इसलिए उन तक पहुंचना बहुत कठिन था । इस लिए वह माया से विभिषण का स्वरूप धारण कर उनकी कुटिया में पहुंच गया।

#श्रीराम जी महिमा देखिए कि दोनों राक्षस सो रहे #राम लक्ष्मण को शिला समेत उठा कर पालात लोक ले गए।

विभिषण जी को जब सारे घटनाक्रम का पता चला तो उन्होंने ने हनुमान जी को उनके पीछे भेजा। हनुमान जी ने पक्षी का रूप धारण कर लिया निकुंभला नगरी पहुंचे। वहां पर कबूतर कबूतरी आपस में बात कर रहे थे कि राम लक्ष्मण दोनों भाईयों की बलि देते ही रावण युद्ध में विजयी हो जाएगा।

इस तरह हनुमान जी को दोनों कबूतर कबूतरी की बातों से ज्ञात हो गया कि महिरावण और अहिरावण दोनों भाई श्री राम लक्ष्मण जी की बलि के लिए पाताल लोक ले गए हैं।

हनुमान जी को वहां प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार दिखा जिसका आधा शरीर मानव का और आधा शरीर मछली का था। उसने हनुमान को द्वार पर रोका और कहने लगा कि मुझे हराये बिना तुम भीतर प्रवेश नहीं कर सकते।

हनुमान जी कहने लगे कि मैं अपने स्वामी श्री राम और उनके भाई लक्ष्मण को अहिरावण और महिरावण बलि देने वाले हैं। मैं उन्हें लेने आया हूं। मकरध्वज कहने लगा कि मैं भी अपने स्वामी अहिरावण के आदेश पर द्वार की सुरक्षा में खड़ा हूं इस लिए मैं आपको भीतर नहीं जाने दे सकता। तब हनुमान जी ने उसे युद्ध में हराया और हनुमान मकरध्वज को अपनी पूंछ में बांध कर भीतर प्रवेश कर गये।

हनुमान जी ने मां कामाक्षी को प्रणाम किया और प्रार्थना की क्या मां आप सचमुच श्री राम और लक्ष्मण जी की बलि देना चाहती है।

मां कहने लगी कि अहिरावण और महिरावण दोनों दैत्य अधर्मी और अत्याचारी है मैं उन दोनों दुष्टों की बलि चाहती हूं। मां ने हनुमान जी को बताया कि मंदिर में अहिरावण ने जो पांच दीपक जलाएं है अगर कोई सारे दीपक एक साथ बुझाएंगा उस समय उनका अंत होगा।

अहिरावण और महिरावण जब मंदिर में प्रवेश करने लगे तो हनुमान जी स्त्री के स्वर में बोले कि मैं कामाक्षी देवी चाहती हूं कि आज तुम दोनों मेरी पूजा झरोखे से करो।

पूजा के अंत में जब बलि देने के लिए श्री राम और लक्ष्मण जी बंधन में ही झरोखे से डाला गया तो दोनों ही निंद्रा में थे। हनुमान जी ने श्री राम और लक्ष्मण जी के बंधन मुक्त कर दिया।

अब मां को अहिरावण और महिरावण की बलि देना कर मां की इच्छा पूर्ति करना शेष था।

हनुमान जी दोनों राक्षसों से युद्ध करने लगे अहिरावण और महिरावण जब मरते तो पांच रूप में पुनः जीवित हो जाते। हनुमान जी को मां के वचन याद आए की जब मंदिर में जल रहे पांचों दीपक एक साथ बुझ जाएंगे तब इन दोनों का अंत होगा I

उत्तर दिशा में वराह मुख , दक्षिण में नरसिंह मुख , पश्चिम में गरूड़, पूर्व में वानर और आकाश की तरफ हयग्रीव मुख धारण कर श्री हनुमान जी ने अपने पांचों मुखों से एक साथ सभी दीपक बुझा दिये। अब हनुमान जी ने दोनों राक्षसों का वध कर दिया।

उसके पश्चात हनुमान जी ने श्री राम और लक्ष्मण जी को चेतना में लाए।

Saturday, April 1, 2023

मैहर धाम - Maihar Dham

 Maihar Dham: चैत्र नवरात्रि में मैहर धाम में मां शारदा के दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां के इस धाम में रोज चमत्कार होता है. जी हां...सुबह मंदिर के पट खोलने पर यहां मां की महिमा का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है.

सतना: मध्यप्रदेश के सतना जिला मुख्यालय से महज 35 किलोमीटर दूर मैहर मां शारदा देवी का मंदिर है, जहां नवरात्रि के 9 दिनों तक भक्तों का मेला लगता है. विश्व प्रसिद्ध मंदिर को देश में 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ माना जाता है. मैहर मां शारदा देवी विंध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर विराजमान हैं. मान्यताओं के अनुसार, मां शारदा ने अपने परम भक्त आल्हा को अमरता का वरदान दिया था. मां शारदा के प्रथम भक्त आल्हा की महिमा भी अलौकिक है.

कहा जाता है कि आज भी मां की प्रथम पूजा आल्हा ही करते हैं. इतना ही नहीं, नवरात्रि के दिनों में आल्हा के द्वारा विशेष पूजा करने की भी बात प्रचलित है. बता दें कि मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है. इसके अलावा वर्तमान में रोप वे के माध्यम से भी श्रद्धालु मां के दरबार तक पहुंचते हैं. नवरात्रि में माता के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगता है. माता सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं.

पट खोलने पर रोज दिखता है चमत्कार…
मैहर मां शारदा देवी ने भक्त आल्हा को अमर होने का वरदान दिया है. ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हखंड के नायक आल्हा उदल दो सगे भाई थे. जो मां शारदा के अनन्य उपासक थे. आल्हा उदल ने ही सबसे पहले जंगल के बीच मां शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी. इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 साल तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था. माता ने उन्हें प्रसन्न होकर अमर होने का वरदान दिया था. ऐसी मान्यता है कि आल्हा ब्रह्म मुहूर्त में मां की विशेष पूजा करते हैं, जिसका प्रमाण आज भी मां के पट खोलने पर सुबह मिलता है. कभी मां की प्रतिमा पर फूल, कभी श्रृंगार, कभी जल चढ़ा हुआ मिलता है.

आल्हा के दर्शन बिना अधूरी है यात्रा
मंदिर परिक्षेत्र में आल्हा देव के मंदिर के साथ आल्हा का अखाड़ा भी है. यहां आज भी भक्तों को उनकी अनुभूति होती है. आल्हा माता के परम भक्त माने जाते हैं. मैहर मां शारदा के मंदिर में जो भी भक्त पूजा अर्चना करने आते हैं, वह भक्त आल्हा की पूजा-अर्चना अवश्य करते हैं. कहते हैं कि आल्हा के दर्शन के बिना मां शारदा के दर्शन अधूरे हैं. मान्यता है कि यहां पर माता सती का हार गिरा था, जिसकी वजह से मैहर का नाम पहले मां का हार अर्थात माई का हार गिरने से माईहार हो गया, जो अपभ्रंश होकर मैहर नाम पड़ गया. इसलिए 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मैहर मां शारदा देवी के मंदिर को माना जाता है. यहां आज भी माई के हार की अखंड ज्योति जल रही है.

प्रतिदिन होता है भव्य श्रृंगार
मैहर मां शारदा देवी का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है, जिसमें सोमवार को माई का सफेद रंग के वस्त्र से श्रृंगार होता है. मंगलवार को नारंगी रंग के वस्त्र, बुधवार को हरे रंग के वस्त्र, गुरुवार को पीले रंग के वस्त्र, शुक्रवार को नीले रंग के वस्त्र, शनिवार को काले रंग के वस्त्र और रविवार को लाल रंग के वस्त्र से माई का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है.

Tuesday, March 28, 2023

हनुमान जी ने भी लिखी थी रामायण

 
🌹हनुमान जी ने भी लिखी थी रामायण🌹

हनुमानजी ने भगवान राम को समर्पित वह रामायण चट्टान पर लिखी थी। उन्होंने लेखनी के लिए अपने नाखूनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह कथा वाल्मीकि से भी पहले लिखी थी।

पवनपुत्र हनुमान भगवान श्रीराम के परम भक्त हैं। वे स्वयं शास्त्रों के महान ज्ञाता और ज्ञानी हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि हनुमानजी ने स्वयं रामायण क्यों नहीं लिखी? श्रीराम की भक्ति से उनको अनेक सिद्धियां प्राप्त थीं। किसी ग्रंथ की रचना करना उनके लिए मुश्किल कार्य नहीं था।

यूं तो श्रीराम पर अनेक रामायण लिखी गई हैं, परंतु इनमें 2 सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं। एक वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और दूसरी तुलसीकृत रामचरित मानस। कहा जाता है कि सबसे पहले हनुमानजी ने ही रामायण लिखी थी लेकिन बाद में उन्होंने वह समुद्र में प्रवाहित कर दी थी। उन्होंने ऐसा क्यों किया? पढ़िए यह कथा..

हनुमानजी ने भगवान राम को समर्पित वह रामायण चट्टान पर लिखी थी। उन्होंने लेखनी के लिए अपने नाखूनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह कथा वाल्मीकि से भी पहले लिखी थी। इसका नाम हनुमद रामायण था।

जब श्रीराम ने रावण सहित अनेक राक्षसों का अंत कर दिया और वे पुनः अयोध्या आ गए तब हनुमानजी हिमालय पर चले गए। वहां वे अपने नाखूनों से रामकथा रचते थे।  

इधर वाल्मीकि भी अपना ग्रंथ पूरा कर चुके थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि ये ग्रंथ भगवान शिव को अर्पित किया जाए। शिव को यह ग्रंथ भेंट करने के लिए वे कैलास पर्वत गए। वहां उन्होंने हनुमानजी द्वारा रची हुई रामायण देखी।

वाल्मीकि महान कवि थे लेकिन हनुमानजी की रचना देखकर तो वे भी चकित रह गए। एक योद्धा ऐसी सुंदर रचना कर सकता है, यह वाल्मीकि के लिए बहुत आश्चर्य की बात थी। उन्होंने हनुमानजी के काव्य की प्रशंसा की और बोले, आपकी रचना के सामने तो मेरा लेखन कुछ भी नहीं है।

यह सुनकर हनुमानजी ने सोचा, वाल्मीकि कवि हैं और श्रीराम के भक्त भी। उनका काव्य मेरी रचना जैसा सुंदर नहीं है तो क्या हुआ, उसमें है तो भगवान श्रीराम की महिमा! इसलिए मुझे ऐसा कार्य करना चाहिए कि उनकी रचना ही संसार में प्रसिद्ध हो।

इसके बाद हनुमानजी ने रामायण लिखी हुई वह शिला उठाई और उसे समुद्र में विसर्जित कर दी। इस प्रकार हनुमानजी द्वारा लिखी गई वह रामायण हमेशा के लिए सागर में समा गई।

वाल्मीकि के लिए हनुमानजी इतना बड़ा त्याग करेंगे, यह उन्होंने कभी सोचा नहीं था। वे हनुमानजी को प्रणाम कर बोले, हे रामदूत हनुमान, आप धन्य हैं। धन्य है आपका त्याग और रामभक्ति।

मैं आपके सामने नतमस्तक हूं और यह वचन देता हूं कि कलियुग में रामायण की रचना के लिए एक जन्म और लूंगा। कहते हैं कि वाल्मीकि की वह इच्छा श्रीराम ने पूर्ण की और वे कलियुग में तुलसीदास बनकर आए। 

🙏🙏🌹 सियावर रामचंद्र की जय पवनसुत हनुमान की जय🌹🙏🙏

Monday, March 27, 2023

Indian God's

 In Pics: This Is How Pretty Indian Gods In Dark Skin Can Look Through The Lens Of This Photographer.

Dark is beautiful of course but not when it comes to our gods. Our gods, that we worship and consider to be the beginning and end to our universe, are expected to be white as milk.

See, even till now, we have the notion that white or fair skin is better than dark skin, which is just further imposed by our very dear advertisement industry, with Fair and Lovely being one of the most popular face-cream brands in India.

Marriage ads have requirements for a ‘fair-skinned girl’; parlour staff, mothers and relatives still pester girls on how to lighten their skin, and India is still obsessed with white skin, but perhaps one area where not much attention is given is to how our gods are represented.

Most of the times, our Indian gods such as Lakshmi, Saraswati, Ganesh, are shown as quite light-skinned in pictures and idols, with a majority being female.

There are a few dark-skinned gods like Shiva, Krishna, Kali and such, but most of the times even their skin is lightened to show a slightly blue-ish colour instead of dark.

However, in a ground-breaking move, a Chennai-based photographer, Naresh Nil came out with a photo-series in December 2017, that reimagined Indian gods with a dark skin.

Creative director Bharadwaj Sundar worked with Naresh on this project.

The series was named ‘Dark Is Divine’ and from September 2017 till the next 2 months, they created about 7 portraits, each featuring a different god.

Sundar stated that the reason for doing this series was the widespread acceptance of Indian gods having light skin colour. After observing a photo in his house, the idea was formed and he added that, “Whether it’s temples within our own homes or the pictures of gods at a barber shop – they are all the same. All of them show gods who are fair.”

Nil on the other hand gave his reason for doing this series as, “Our idea was born out of this very notion of acceptance of fair as divine, which to me is more about normalisation of this concept in society.”

Apparently, it was not just the gods who had to be dark skinned, but the models portraying them also had to comfortable with their complexion.

Nil said that, “The most essential consideration was whether the models themselves were comfortable in presenting and associating themselves with the representation of their skin tone.”

The image of Lakshmi sitting in her iconic setting on a lotus is highlighted further when you see the dark colour of her skin. It contrasts a lot with how she is normally presented in other areas with light to almost white skin.

Model Suruthi Periyasamy was chosen to represent Goddess Lakshmi and she does full justice here.

Another reason to do this series was to increase relate-ability with our gods. Sundar said that, “Everyone here prefers fair skin. But I am a dark-skinned person and all my friends are dark-skinned too. So how do I identify with fair-skinned gods and goddesses?”

Krishna is canonically known to be dark skinned, in south India many of his idols are created from black coloured material, but even then his complexion is sidelined.

In many photographs and figures, he is often given blue coloured or sometimes fair skin which is not right perhaps.

This image is that of Bala Murugan, an avatar of Subramanya who is often depicted with flowing black hair and extremely light complexion.

Apparently, Naresh and Bhardwaj had planned to showcase 12 Gods and Goddesses, but due to time and budget constraints they could only do 6.

There were some people who felt that there was bias being shown by portraying Kali as dark-skinned, but even in that, there is not much wrong here.

Also, many of the poses, styles and visualisations of the images were inspired from that of Raja Ravi Verma’s portraits.

Naresh in reference to the use of Verma’s paintings said that, “Our focus was plain and simple, how are Gods or divinity presented in common culture, and by common we mean our immediate surroundings, whatever we come across in our everyday life.”

Instead of taking known models, the duo recruited unknown models who could match their requirements and give it a more real aesthetic.

Shiva who is depicted here, is known to have slightly dark skin, with him also being called ‘Neel Kanth’, but in family portraits with Parvati and Ganesh, his complexion is often changed to being lighter than it should be or made to look blue.

This image of Saraswati having dark skin was the most striking, since she is often portrayed as having completely milky-white skin.

Bhardwaj said that, “The ultimate victory for such a project would be if someone printed one of the photos and perhaps added it to their place of worship in their home and prayed to that god.”

This image of Sita with her sons Luv and Kusha was not initially going to be in the series.

But their make-up artist Sridevi Ramesh who created the looks of all the Gods and Goddesses in the photos requested that one more image be added and it was this one.

Aren’t you in love with these pictures already? Tell us your view in the comments below.

Thursday, March 23, 2023

बहाने V/S सफलता 🏆🏆🏆 Motivational Story

 😔😔😔 बहाने V/S सफलता 🏆🏆🏆 Motivational Story


1. मैं इतनी बार हार चुका , अब हिम्मत नही...!
अब्राहम लिंकन 15 बार चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने।

3.मै अत्यंत गरीब घर से हूँ ...!
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे ।

4. मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नही मिला...!
उचित शिक्षा का अवसर भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी भारत मे नही मिला था..फिर उन्होंने अमेरिका में स्कालरशिप से पढ़ाई की

5.बचपन से ही अस्वस्थ था...!
आँस्कर विजेता अभिनेत्री मरली मेटलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थी ।

6.मैने साइकिल पर घूमकर आधी ज़िंदगी गुजारी है...!
निरमा के मालिक करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचा और एम डी एच के ताउ ने टांगे पर मसाला बेचा और ज़िंदगी गुजारी ।

7.एक दुर्घटना मे अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी...!
प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चन्द्रन को देख लो इनके पैर नकली है ।

8.मुझे बचपन से मंद बुद्धि कहा जाता है...!
थामस अल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुद्धि कहा जता था।

9.बचपन मे ही मेरे पिता का देहाँत हो गया था...!
प्रख्यात संगीतकार ए.आर.रहमान के पिता का भी देहांत बचपन मे हो गया था।

10.मुझे बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी...!
लता मंगेशकर को भी बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी थी।

11.मेरी लंबाई बहुत कम है...!
सचिन तेंदुलकर की भी लंबाई कम है।

12.मै एक छोटी सी नौकरी करता हूँ ...!
इससे क्या होगा... धीरु अंबानी भी छोटी नौकरी करते थे।पम्प पे तेल भरने की |

13.मेरी कम्पनी एक बार दिवालिया हो चुकी है , अब मुझ पर कौन भरोसा करेगा...!
दुनिया की सबसे बङी शीतल पेय निर्माता पेप्सी कोला भी दो बार दिवालिया हो चुकी है ।

14.मेरा दो बार नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका है , अब क्या कर पाउँगा...!
डिज्नीलैंड बनाने के पहले वाल्ट डिज्नी का तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था।

15.मेरी उम्र बहुत ज्यादा है....!
विश्व प्रसिद्ध केंटुकी फ्राइड चिकेन के मालिक ने 60 साल की उम्र मे पहला रेस्तरा खोला था।
अभिताभ ने अपनी पहली फिलम 27 की उम्र में बनाई थी.

16.मेरे पास बहुमूल्य आइडिया है पर लोग अस्वीकार कर देते है...!
जेराँक्स फोटो कापी मशीन के आईडिया को भी ढेरो कंपनियो ने अस्वीकार किया था पर आज परिणाम सामने है ।

17.मेरे पास धन नही...!
इन्फोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास भी धन नही था उन्हे अपनी पत्नी के गहने बेचने पङे।

18.मुझे ढेरो बीमारियां है..!
वर्जिन एयरलाइंस के प्रमुख भी अनेको बीमारियो मे थे |
राष्ट्रपति रुजवेल्ट के दोनो पैर काम नही करते थे।
स्टीफन हांकिंग को तो आप जानते ही होंगे।

आज आप जहाँ भी है या कल जहाँ भी होगे इसके लिए आप किसी और को जिम्मेदार नही ठहरा सकते ,
हर कामयाब और नाकामयाब इंसान को बिल्कुल उतना ही समय मिलता है, 24 घंटे
ये डिपेंड करता है कि आप कैसे इन्हें खर्च करते हो.
इसलिए आज चुनाव करिये - सफलता और सपने चाहिए या खोखले बहाने.!

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...