Sunday, April 30, 2023

ब्रह्मगिरीपर्वत का रहस्य

 "ब्रह्मगिरीपर्वत"

          वराहपुराण में और पद्मपुराण में ऐसा लिखा है कि पहले ब्रह्मा जी ने 60 हजार वर्ष तक तप किया फिर भी गोपियों की रज नहीं मिली। उसके बाद सतयुग के अन्त में ब्रह्मा जी ने फिर तप किया भगवान ने कहा, कि तुम क्या चाहते हो ? 

          ब्रह्मा जी बोले, कि सब गोपियों की रज मिल जाये व माधुर्यमयी लीलाएँ देखने को मिले। 

          भगवान ने कहा, कि वहाँ पुरुषों का प्रवेश नहीं है। 

          ब्रह्मा जी बोले, फिर ? 

          भगवान ने कहा, कि तुम पर्वत बन जाओ। 

          ब्रह्मा जी बोले, कहाँ ? 

          भगवान ने कहा,  कि तुम ब्रज में चले जाओ। 

          ब्रह्मा जी ने कहा, कि ब्रज तो बहुत बड़ा है, कहाँ जायें ? 

          भगवान बोले, कि वृषभानुपुर यानि बरसाना चले जाओ। वहाँ पर्वत बन जाना, अपने आप सब लीला मिल जायेगी व गोपियों की चरण रज भी मिल जायेगी। बरसाना वहाँ नित्य श्री राधा रानी के चरण मिलेंगे। 

          तब ब्रह्मा जी यहाँ आकर पर्वत बन गए। 

          एक कथा आती है बरसाने के पर्वतों के बारे में कि जब भगवान सती अनुसुइया की परीक्षा लेने गये थे तो वहाँ उसने ब्रह्मा विष्णु शिव को श्राप दिया कि तुमने बड़ा अमर्यादित व्यवहार किया है इसीलिए जाओ पर्वत बन जाओ। तो तीनों देवता पर्वत बन गये और उनका नाम त्रिंग हुआ। 

          जब श्री राम जी का सेतु बंधन हो रहा था तो पर्वत लाये जा रहे थे। त्रिंग को जब हनुमान जी ला रहे थे तो आकाशवाणी हुई कि अब पर्वत मत लाओ क्योंकि सेतु बंधन हो चुका है। तो जब हनुमान जी ने उसे यहाँ पर रख दिया तो गिरिराज जी बोले कि हनुमान जी हम तुमको श्राप दे देंगे। हे वानर राज तुमने हमारा प्रभु से मिलन नहीं होने दिया। तो हनुमान जी ने प्रभु से प्रार्थना की। तब राम जी ने कहा कि मैं स्वयं श्री कृष्ण के रूप में उनको अपने हाथों से धारण करूँगा जब की औरों को तो सिर्फ चरण स्पर्श ही दूँगा। 

          एक पुराण में लिखा है कि स्वयं राम जी आये और उन्होंने जो त्रिंग थे, ब्रह्मा विष्णु शिव, इन तीनों को अलग-अलग करके यहाँ स्थापित किया। ‘नन्दगाँव’ में शिव जी को स्थापित किया, ’नन्दीश्वर‘ के रूप में, और ‘गोवर्धन‘ में विष्णु को ‘गिरिराज’ जी के रूप में, ब्रह्मा जी यहाँ ‘बरसाने’ में स्थापित किये ‘ब्रह्मगिरी पर्वत‘ के रूप में। ब्रह्मगिरी के चार शिखर हैं, चार गढ़ है, मानगढ़, दानगढ़, भानुगढ़, विलासगढ़। ये जितने शिखर हैं ये ब्रह्मा जी के मस्तक हैं।

                             "जय जय श्री राधे"


Friday, April 21, 2023

माता शबरी की प्रतीक्षा

 शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।


शबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी।


महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया "पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।"


अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा- कब आएंगे..?


महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे। महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया।


 आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए।ये उलट कैसे हुआ। गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ???


महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका।

महर्षि मतंग बोले- 

पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ।

अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ।

उनका कौशल्या से विवाह होगा।फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। 

फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा।फिर प्रतीक्षा..


फिर उनका विवाह कैकई से होगा।फिर प्रतीक्षा.. 


फिर वो जन्म लेंगे, फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा।फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा। तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे।तुम उन्हें कहना आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।


शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।


वह फिर अधीर होकर पूछने लगी- "इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव???"


महर्षि मतंग बोले- "वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे।यह भावी निश्चित है। लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे "अवश्य"...!


जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे। इसलिए प्रतीक्षा करना।वे कभी भी आ सकते है। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।"


शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी।वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। 


हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती।


कभी भी आ सकतें हैं।

हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा। शबरी बूढ़ी हो गई।लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही।


और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी।


गुरु का कथन सत्य हुआ।भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।


ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो। एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे-


"कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..?"


राम मुस्कुराए- "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..?"


"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।


राम ने कहा- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है।”


"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।


”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...!” (वानरी भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। ”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...।" (मार्जारी भाव)


राम मुस्कुराकर रह गए!!


भीलनी ने पुनः कहा- "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं!" तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..?”


राम गम्भीर हुए और कहा-


भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने आया है..?”


रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है।


राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।”


"जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"


राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि "शासन/प्रशासन और सत्ता" जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है।”

(अंत्योदय)


राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!


माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।


राम ने फिर कहा-


राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।”


"राम राजमहल से निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।”


"राम निकला है, ताकि “भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए।”


और


"राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है।”


शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा-  "बेर खाओगे राम..?”


राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"


शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये।


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु..?” 


"यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”


सबरी मुस्कुराईं, बोली-   "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"


मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन!

🙏🏻💐 #जय_श्री_राम💐🙏

🚩🙏#सनातन_धर्म_सर्वश्रेष्ठ_है 🚩🙏

Tuesday, April 18, 2023

“रामायण” क्या है?

 “रामायण” क्या है?

अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना.......

रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊

एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। 

नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ?

मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।

माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया |

श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं

माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ? 

क्या नींद नहीं आ रही ?

शत्रुघ्न कहाँ है ?

श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, 

गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।

उफ ! 

कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।

तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए । 

आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, 

माँ चली ।

आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?

अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !! 

माँ सिराहने बैठ गईं, 

बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं, 

माँ !

उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? 

मुझे बुलवा लिया होता ।

माँ ने कहा, 

शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"

शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, 

भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?

माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।

देखो क्या है ये रामकथा...

यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!!

यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा...  चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।

"रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।

भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!!

परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! 

माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. 

परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, 

परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.??

क्या बोलूँगा उनसे.?

यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- 

"आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"

लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!!

परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!!

वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!!

लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!!

वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!!

मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!!

तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।

यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!!

माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!!

मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!!

माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?

क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?

हनुमान जी पूछते हैं- देवी! 

आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। 

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा.!!

उर्मिला बोलीं- "

मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता.!!

रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता.!!

आपने कहा कि, प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं..!

जो “योगेश्वर प्रभु श्री राम” की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता..!!

यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं..

मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं..

उन्होंने न सोने का प्रण लिया था..इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं..और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया...वे उठ जायेंगे..!!

और “शक्ति” मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है.!!

मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा.!!

इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ..सूर्य उदित नहीं होगा।"

राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं... 

कभी “सीता” तो कभी “उर्मिला”..!!

 भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया ..परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया .!!

जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है... 

कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा .,जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा .!!

"लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो,

स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो.. 

नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो, 

चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो..

हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो, 

लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो.. 

श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो, 

हनुमत के जैसी निष्ठा और शक्ति हो... "

ये रामायण है, पुण्य कथा श्री राम की।

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Wednesday, April 12, 2023

भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ- Devotional Story

भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ

जगन्नाथ पूरी में माधव दास नाम के एक भक्त रहा करते थे। माधव दास जी सांसारिक मोह माया से दूर रहते और केवल भगवान जगन्नाथ के भजन व दर्शन किया करते थे। माधव दास जी भगवान जगन्नाथ को अपना मित्र मानते थे और वे हमेशा जगन्नाथ जी से बाते करते,  उनके साथ खेलते थे। इस प्रकार माधव दास अपनी भक्ति में सदैव मस्त-मग्न रहते थे।

एक बार ऐसा समय आया जब माधव दास जी को अतिसार यानि उलटी-दस्त का रोग हो गया। जिसकी वजह से वह इतने दुर्बल हो गए कि उनसे उठा-बैठा जाना भी नहीं हो रहा था। उनकी इस हालत को देखकर आस-पास के लोग उनकी सेवा करने को आते लेकिन माधव दास उनसे कह देते कि मेरे तो एक जगन्नाथ ही हैं, वही मेरी रक्षा करेंगे। ऐसा करते-करते जब रोग बहुत बढ़ गया तब भगवान से भी अपने भक्त की हालत देखी नही गई और वे स्वंय सेवक बनकर उनके घर पहुंचे और माधव दास से कहने लगे क्या हम आपकी सेवा कर दें। क्योंकि माधव दास का रोग इतना बढ़ गया था कि उनको पता भी नही रहता, वे कब मल-मूत्र त्याग देते थे और वैसे ही वस्त्र गंदे पड़े रहते। अपने भक्त की यह दशा भगवान से देखी नहीं गई और वे स्वंय माधव दास के वस्त्रों को अपने हाथों से साफ करते, उसके पश्चात भगवान माधव दास के पूरे शरीर को साफ किया करते, उनको स्वच्छ रखते थे। कुछ समय बाद जब माधवदास की चेतना वापिस आई तो वे तुरंत ही भगवान जगन्नाथ जी को पहचान गए और कहने लगे मेरे प्रभु मेरी रक्षा के लिए स्वंय आ गए।


माधव दास ने भगवान से पूछा- प्रभु, आप तो त्रिभुवन के स्वामी हो, तो फिर आप मेरी सेवा क्यों कर रहे हो। यदि आप चाहे तो मेरे रोग को पल मे ही दूर कर सकते हैं, तो प्रभु यह सब आपको नही करना पड़ता।

भगवान कहते हैं- हे माधव, मुझसे मेरे प्यारे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता, इसलिए मैनें यहां आकर तुम्हारी सेवा की और जो नियति में लिखा हो उसे भोगना तो अवश्य होता हैं, इसलिए मैंने तुम्हें ठीक नही किया, क्योंकि यदि इस रोग को मैं अभी ठीक कर देता तो तुम्हें यह भोगना के लिए पुन: जन्म लेना होता और मैं नहीं चाहता की मेरे भक्त को एक प्रारब्ध के कारण पुनः जन्म लेना पड़े। लेकिन यदि फिर भी तुम कहते हो तो मैं अपने भक्त की बात नहीं टाल सकता। हे माधव, अभी तुम्हारे प्रारब्ध के 15 दिन का रोग शेष बचा है, इसलिए अब यह 15 दिन का रोग मैं तुमसे ले लेता हूं। इस प्रकार भगवान ने 15 दिन के रोग को अपने ऊपर ले लिया और अपने भक्त की रक्षा करी।

तब से भगवान जगन्नाथ जी साल मैं एक बार बीमार पड़ते हैं और इसलिए हर वर्ष उन्हें स्नान कराया जाता है। 15 दिन के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। भगवान को 56 भोग नहीं खिलाया जाता, बीमार होने के कारण परहेज किया जाता हैं। इन 15 दिनों में जगन्नाथ भगवान को काढ़ा पिला़या जाता है और उनकी सेवा की जाती है। जिससे वे जल्दी ठीक हो जाएं और अपने भक्तों के दर्शन दे सके। अपने भक्तों का जीवन सुखमयी बनाने के लिए भगवान ने रोग को अपने ऊपर ले लिया, ऐसे हैं हमारे भक्तवत्सल भगवान जगन्नाथ जी. 🌹 हरि शरणम् 🌹 

🙏 जय श्री हरि , जय श्रीकृष्ण,  प्रेम से बोलो ...राधे राधे 🌷

Monday, April 10, 2023

हनुमान जी की अद्भुत भक्ति - Devotional Story

 हनुमान जी की अद्भुत भक्ति

जय श्री राम 

महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जगत को त्रास देने वाला रावण अपने कुटुंब सहित नष्ट हो चुका था। कौशलाधीश राम के नेतृत्व में चहुँओर शांति थी।

राम का राज्याभिषेक हुआ। राजा राम ने सभी वानर और राक्षस मित्रों को ससम्मान विदा किया। अंगद को विदा करते समय राम रो पड़े थे। हनुमान को विदा करने की शक्ति तो श्रीराम में भी नहीं थी। माता सीता भी उन्हें पुत्रवत मानती थीं। हनुमान अयोध्या में ही रह गए।

राम दिन भर दरबार में, शासन व्यवस्था में व्यस्त रहे। संध्या जब शासकीय कार्यों से छूट मिली तो गुरु और माताओं का कुशलक्षेम पूछ अपने कक्ष में आए। हनुमान उनके पीछे-पीछे ही थे। राम के निजी कक्ष में उनके सारे अनुज अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उपस्थित थे। वनवास, युद्ध, और फिर अंनत औपचारिकताओं के पश्चात यह प्रथम अवसर था जब पूरा परिवार एक साथ उपस्थित था। राम, सीता और लक्ष्मण को तो नहीं, कदाचित अन्य वधुओं को एक बाहरी, अर्थात हनुमान का वहाँ होना अनुचित प्रतीत हो रहा था। चूंकि शत्रुघ्न सबसे छोटे थे, अतः वे ही अपनी भाभियों और अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति हेतु संकेतों में ही हनुमान को कक्ष से जाने के लिए कह रहे थे। पर आश्चर्य की बात कि हनुमान जैसा ज्ञाता भी यह मामूली संकेत समझने में असमर्थ हो रहा था।

अस्तु, उनकी उपस्थिति में ही बहुत देर तक सारे परिवार ने जी भर कर बातें कीं। फिर भरत को ध्यान आया कि भैया-भाभी को भी एकांत मिलना चाहिए। उर्मिला को देख उनके मन में हूक उठती थी। इस पतिव्रता को भी अपने पति का सानिध्य चाहिए। अतः उन्होंने राम से आज्ञा ली, और सबको जाकर विश्राम करने की सलाह दी। सब उठे और राम-जानकी का चरणस्पर्श कर जाने को हुए। परन्तु हनुमान वहीं बैठे रहे। उन्हें देख अन्य सभी उनके उठने की प्रतीक्षा करने लगे कि सब साथ ही निकले बाहर।

राम ने मुस्कुराते हुए हनुमान से कहा, "क्यों वीर, तुम भी जाओ। तनिक विश्राम कर लो।"

हनुमान बोले, "प्रभु, आप सम्मुख हैं, इससे अधिक विश्रामदायक भला कुछ हो सकता है? मैं तो आपको छोड़कर नहीं जाने वाला।"

शत्रुघ्न तनिक झुंझलाकर बोले, "परन्तु भैया को विश्राम की आवश्यकता है कपीश्वर! उन्हें एकांत चाहिए।"

"हाँ तो मैं कौन सा प्रभु के विश्राम में बाधा डालता हूँ। मैं तो यहाँ पैताने बैठा हूँ।"

"आपने कदाचित सुना नहीं। भैया को एकांत की आवश्यकता है।"

"पर माता सीता तो यहीं हैं। वे भी तो नहीं जा रही। फिर मुझे ही क्यों निकालना चाहते हैं आप?"

"भाभी को भैया के एकांत में भी साथ रहने का अधिकार प्राप्त है। क्या उनके माथे पर आपको सिंदूर नहीं दिखता?

हनुमान आश्चर्यचकित रह गए। प्रभु श्रीराम से बोले, "प्रभु, क्या यह सिंदूर लगाने से किसी को आपके निकट रहने का अधिकार प्राप्त हो जाता है?"

राम मुस्कुराते हुए बोले, "अवश्य। यह तो सनातन प्रथा है हनुमान।"

यह सुन हनुमान तनिक मायूस होते हुए उठे और 

राम-जानकी को प्रणाम कर बाहर चले गए।

प्रातः राजा राम का दरबार लगा था। साधारण औपचारिक कार्य हो रहे थे कि नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी न्याय मांगते दरबार में उपस्थित हुए। ज्ञात हुआ कि पूरी अयोध्या में रात भर व्यापारियों के भंडारों को तोड़-तोड़ कर हनुमान उत्पात मचाते रहे थे। राम ने यह सब सुना और सैनिकों को आदेश दिया कि हुनमान को राजसभा में उपस्थित किया जाए। रामाज्ञा का पालन करने सैनिक अभी निकले भी नहीं थे कि केसरिया रंग में रंगे-पुते हनुमान अपनी चौड़ी मुस्कान और हाथी जैसी मस्त चाल से चलते हुए सभा में उपस्थित हुए। उनका पूरा शरीर सिंदूर से पटा हुआ था। एक-एक पग धरने पर उनके शरीर से एक-एक सेर सिंदूर भूमि पर गिर जाता। उनकी चाल के साथ पीछे की ओर वायु के साथ सिंदूर उड़ता रहता।

राम के निकट आकर उन्होंने प्रणाम किया। अभी तक सन्न होकर देखती सभा, एकाएक जोर से हँसने लगी। अंततः बंदर ने बंदरों वाला ही काम किया। अपनी हँसी रोकते हुए सौमित्र लक्ष्मण बोले, "यह क्या किया कपिश्रेष्ठ? यह सिंदूर से स्नान क्यों? क्या यह आप वानरों की कोई प्रथा है?"

हनुमान प्रफुल्लित स्वर में बोले, "अरे नहीं भैया। यह तो आर्यों की प्रथा है। मुझे कल ही पता चला कि अगर एक चुटकी सिंदूर लगा लो तो प्रभु राम के निकट रहने का अधिकार मिल जाता है। तो मैंने सारी अयोध्या का सिंदूर लगा लिया। क्यों प्रभु, अब तो कोई मुझे आपसे दूर नहीं कर पाएगा न?"

सारी सभा हँस रही थी। और भरत हाथ जोड़े अश्रु बहा रहे थे। यह देख शत्रुघ्न बोले, "भैया, सब हँस रहे हैं और आप रो रहे हैं? क्या हुआ?"

भरत स्वयं को सम्भालते हुए बोले, "अनुज, तुम देख नहीं रहे! वानरों का एक श्रेष्ठ नेता, वानरराज का सबसे विद्वान मंत्री, कदाचित सम्पूर्ण मानवजाति का सर्वश्रेष्ठ वीर, सभी सिद्धियों, सभी निधियों का स्वामी, वेद पारंगत, शास्त्र मर्मज्ञ यह कपिश्रेष्ठ अपना सारा गर्व, सारा ज्ञान भूल कैसे रामभक्ति में लीन है। राम की निकटता प्राप्त करने की कैसी उत्कट इच्छा, जो यह स्वयं को भूल चुका है। ऐसी भक्ति का वरदान कदाचित ब्रह्मा भी किसी को न दे पाएं। मुझ भरत को राम का अनुज मान भले कोई याद कर ले, पर इस भक्त शिरोमणि हनुमान को संसार कभी भूल नहीं पाएगा। हनुमान को बारम्बार प्रणाम।"


Friday, April 7, 2023

हनुमान जी की पंचमुखी अवतार कथा - Devotional Story

हनुमान जी श्री राम के परम भक्त हैं। बल बुद्धि के धाम है। उन्हें संकट मोचन भी कहा जाता है।

लंका युद्ध के पश्चात् जब मेघनाद मारा गया तो रावण को अपने दो भाईयों अहिरावण और महिरावण से जो कि तंत्र विद्या के महाज्ञानी थे उनकी मदद मांगी।

दोनों भाई मां कामाक्षी के परम भक्त थे। रावण ने कहा कि अपने छल कपट से दोनों भाई राम लक्ष्मण का वध कर देना। जब वह सुबेल पर्वत पर पहुंचे तो दोनों भाईयों की सुरक्षा बहुत कड़ी थी इसलिए उन तक पहुंचना बहुत कठिन था । इस लिए वह माया से विभिषण का स्वरूप धारण कर उनकी कुटिया में पहुंच गया।

#श्रीराम जी महिमा देखिए कि दोनों राक्षस सो रहे #राम लक्ष्मण को शिला समेत उठा कर पालात लोक ले गए।

विभिषण जी को जब सारे घटनाक्रम का पता चला तो उन्होंने ने हनुमान जी को उनके पीछे भेजा। हनुमान जी ने पक्षी का रूप धारण कर लिया निकुंभला नगरी पहुंचे। वहां पर कबूतर कबूतरी आपस में बात कर रहे थे कि राम लक्ष्मण दोनों भाईयों की बलि देते ही रावण युद्ध में विजयी हो जाएगा।

इस तरह हनुमान जी को दोनों कबूतर कबूतरी की बातों से ज्ञात हो गया कि महिरावण और अहिरावण दोनों भाई श्री राम लक्ष्मण जी की बलि के लिए पाताल लोक ले गए हैं।

हनुमान जी को वहां प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार दिखा जिसका आधा शरीर मानव का और आधा शरीर मछली का था। उसने हनुमान को द्वार पर रोका और कहने लगा कि मुझे हराये बिना तुम भीतर प्रवेश नहीं कर सकते।

हनुमान जी कहने लगे कि मैं अपने स्वामी श्री राम और उनके भाई लक्ष्मण को अहिरावण और महिरावण बलि देने वाले हैं। मैं उन्हें लेने आया हूं। मकरध्वज कहने लगा कि मैं भी अपने स्वामी अहिरावण के आदेश पर द्वार की सुरक्षा में खड़ा हूं इस लिए मैं आपको भीतर नहीं जाने दे सकता। तब हनुमान जी ने उसे युद्ध में हराया और हनुमान मकरध्वज को अपनी पूंछ में बांध कर भीतर प्रवेश कर गये।

हनुमान जी ने मां कामाक्षी को प्रणाम किया और प्रार्थना की क्या मां आप सचमुच श्री राम और लक्ष्मण जी की बलि देना चाहती है।

मां कहने लगी कि अहिरावण और महिरावण दोनों दैत्य अधर्मी और अत्याचारी है मैं उन दोनों दुष्टों की बलि चाहती हूं। मां ने हनुमान जी को बताया कि मंदिर में अहिरावण ने जो पांच दीपक जलाएं है अगर कोई सारे दीपक एक साथ बुझाएंगा उस समय उनका अंत होगा।

अहिरावण और महिरावण जब मंदिर में प्रवेश करने लगे तो हनुमान जी स्त्री के स्वर में बोले कि मैं कामाक्षी देवी चाहती हूं कि आज तुम दोनों मेरी पूजा झरोखे से करो।

पूजा के अंत में जब बलि देने के लिए श्री राम और लक्ष्मण जी बंधन में ही झरोखे से डाला गया तो दोनों ही निंद्रा में थे। हनुमान जी ने श्री राम और लक्ष्मण जी के बंधन मुक्त कर दिया।

अब मां को अहिरावण और महिरावण की बलि देना कर मां की इच्छा पूर्ति करना शेष था।

हनुमान जी दोनों राक्षसों से युद्ध करने लगे अहिरावण और महिरावण जब मरते तो पांच रूप में पुनः जीवित हो जाते। हनुमान जी को मां के वचन याद आए की जब मंदिर में जल रहे पांचों दीपक एक साथ बुझ जाएंगे तब इन दोनों का अंत होगा I

उत्तर दिशा में वराह मुख , दक्षिण में नरसिंह मुख , पश्चिम में गरूड़, पूर्व में वानर और आकाश की तरफ हयग्रीव मुख धारण कर श्री हनुमान जी ने अपने पांचों मुखों से एक साथ सभी दीपक बुझा दिये। अब हनुमान जी ने दोनों राक्षसों का वध कर दिया।

उसके पश्चात हनुमान जी ने श्री राम और लक्ष्मण जी को चेतना में लाए।

Saturday, April 1, 2023

मैहर धाम - Maihar Dham

 Maihar Dham: चैत्र नवरात्रि में मैहर धाम में मां शारदा के दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां के इस धाम में रोज चमत्कार होता है. जी हां...सुबह मंदिर के पट खोलने पर यहां मां की महिमा का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है.

सतना: मध्यप्रदेश के सतना जिला मुख्यालय से महज 35 किलोमीटर दूर मैहर मां शारदा देवी का मंदिर है, जहां नवरात्रि के 9 दिनों तक भक्तों का मेला लगता है. विश्व प्रसिद्ध मंदिर को देश में 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ माना जाता है. मैहर मां शारदा देवी विंध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर विराजमान हैं. मान्यताओं के अनुसार, मां शारदा ने अपने परम भक्त आल्हा को अमरता का वरदान दिया था. मां शारदा के प्रथम भक्त आल्हा की महिमा भी अलौकिक है.

कहा जाता है कि आज भी मां की प्रथम पूजा आल्हा ही करते हैं. इतना ही नहीं, नवरात्रि के दिनों में आल्हा के द्वारा विशेष पूजा करने की भी बात प्रचलित है. बता दें कि मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है. इसके अलावा वर्तमान में रोप वे के माध्यम से भी श्रद्धालु मां के दरबार तक पहुंचते हैं. नवरात्रि में माता के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगता है. माता सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं.

पट खोलने पर रोज दिखता है चमत्कार…
मैहर मां शारदा देवी ने भक्त आल्हा को अमर होने का वरदान दिया है. ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हखंड के नायक आल्हा उदल दो सगे भाई थे. जो मां शारदा के अनन्य उपासक थे. आल्हा उदल ने ही सबसे पहले जंगल के बीच मां शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी. इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 साल तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था. माता ने उन्हें प्रसन्न होकर अमर होने का वरदान दिया था. ऐसी मान्यता है कि आल्हा ब्रह्म मुहूर्त में मां की विशेष पूजा करते हैं, जिसका प्रमाण आज भी मां के पट खोलने पर सुबह मिलता है. कभी मां की प्रतिमा पर फूल, कभी श्रृंगार, कभी जल चढ़ा हुआ मिलता है.

आल्हा के दर्शन बिना अधूरी है यात्रा
मंदिर परिक्षेत्र में आल्हा देव के मंदिर के साथ आल्हा का अखाड़ा भी है. यहां आज भी भक्तों को उनकी अनुभूति होती है. आल्हा माता के परम भक्त माने जाते हैं. मैहर मां शारदा के मंदिर में जो भी भक्त पूजा अर्चना करने आते हैं, वह भक्त आल्हा की पूजा-अर्चना अवश्य करते हैं. कहते हैं कि आल्हा के दर्शन के बिना मां शारदा के दर्शन अधूरे हैं. मान्यता है कि यहां पर माता सती का हार गिरा था, जिसकी वजह से मैहर का नाम पहले मां का हार अर्थात माई का हार गिरने से माईहार हो गया, जो अपभ्रंश होकर मैहर नाम पड़ गया. इसलिए 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मैहर मां शारदा देवी के मंदिर को माना जाता है. यहां आज भी माई के हार की अखंड ज्योति जल रही है.

प्रतिदिन होता है भव्य श्रृंगार
मैहर मां शारदा देवी का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है, जिसमें सोमवार को माई का सफेद रंग के वस्त्र से श्रृंगार होता है. मंगलवार को नारंगी रंग के वस्त्र, बुधवार को हरे रंग के वस्त्र, गुरुवार को पीले रंग के वस्त्र, शुक्रवार को नीले रंग के वस्त्र, शनिवार को काले रंग के वस्त्र और रविवार को लाल रंग के वस्त्र से माई का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है.

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...