Thursday, February 16, 2023

महाशिवरात्रि का महत्व mahashivratri ka mahatva

 महाशिवरात्रि का महत्व



महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को, शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु, साधकों के लिए, यह वह दिन है, जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे। वे एक पर्वत की भाँति स्थिर व निश्चल हो गए थे। यौगिक परंपरा में, शिव को किसी देवता की तरह नहीं पूजा जाता। उन्हें आदि गुरु माना जाता है, पहले गुरु, जिनसे ज्ञान उपजा। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के पश्चात्, एक दिन वे पूर्ण रूप से स्थिर हो गए। वही दिन महाशिवरात्रि का था। उनके भीतर की सारी गतिविधियाँ शांत हुईं और वे पूरी तरह से स्थिर हुए, इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

इसके पीछे की कथाओं को छोड़ दें, तो यौगिक परंपराओं में इस दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक साधक के लिए बहुत सी संभावनाएँ मौजूद होती हैं। आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से होते हुए, आज उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ उन्होंने आपको प्रमाण दे दिया है कि आप जिसे भी जीवन के रूप में जानते हैं, पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं, जिसे आप ब्रह्माण्ड और तारामंडल के रूप में जानते हैं; वह सब केवल एक ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों-करोड़ों रूपों में प्रकट करती है। यह वैज्ञानिक तथ्य प्रत्येक योगी के लिए एक अनुभव से उपजा सत्य है। ‘योगी’ शब्द से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, जिसने अस्तित्व की एकात्मकता को जान लिया है। जब मैं कहता हूँ, ‘योग’, तो मैं किसी विशेष अभ्यास या तंत्र की बात नहीं कर रहा। इस असीम विस्तार को तथा अस्तित्व में एकात्म भाव को जानने की सारी चाह, योग है। महाशिवारात्रि की रात, व्यक्ति को इसी का अनुभव पाने का अवसर देती है।


शिवरात्रि – महीने का सबसे ज्यादा अँधेरे से भरा दिन

शिवरात्रि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिवस होता है। प्रत्येक माह शिवरात्रि का उत्सव तथा महाशिवरात्रि का उत्सव मनाना ऐसा लगता है मानो हम अंधकार का उत्सव मना रहे हों। कोई तर्कशील मन अंधकार को नकारते हुए, प्रकाश को सहज भाव से चुनना चाहेगा। परंतु शिव का शाब्दिक अर्थ ही यही है, ‘जो नहीं है’। ‘जो है’, वह अस्तित्व और सृजन है। ‘जो नहीं है’, वह शिव है। ‘जो नहीं है’, उसका अर्थ है, अगर आप अपनी आँखें खोल कर आसपास देखें और आपके पास सूक्ष्म दृष्टि है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे। अगर आपकी दृष्टि केवल विशाल वस्तुओं पर जाती है, तो आप देखेंगे कि विशालतम शून्य ही, अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है। कुछ ऐसे बिंदु, जिन्हें हम आकाशगंगा कहते हैं, वे तो दिखाई देते हैं, परंतु उन्हें थामे रहने वाली विशाल शून्यता सभी लोगों को दिखाई नहीं देती। इस विस्तार, इस असीम रिक्तता को ही शिव कहा जाता है। वर्तमान में, आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है। इसी संदर्भ में शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में, सदा दिव्यता की सर्वव्यापी प्रकृति की बात की जाती रही है। यदि हम इसे देखें, तो ऐसी एकमात्र चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है, ऐसी वस्तु जो हर स्थान पर उपस्थित हो सकती है, वह केवल अंधकार, शून्यता या रिक्तता ही है। सामान्यतः, जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं, तो हम उस दिव्य को प्रकाश के रूप में दर्शाते हैं। जब लोग अपने कल्याण से ऊपर उठ कर, अपने जीवन से परे जाने पर, विलीन होने पर ध्यान देते हैं और उनकी उपासना और साधना का उद्देश्य विलयन ही हो, तो हम सदा उनके लिए दिव्यता को अंधकार के रूप में परिभाषित करते हैं।


शिवरात्रि का महत्व

प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना है। प्रकाश शाश्वत नहीं है, यह सदा से एक सीमित संभावना है क्योंकि यह घट कर समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि इस ग्रह पर सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्त्रोत है। यहाँ तक कि आप हाथ से इसके प्रकाश को रोक कर भी, अंधेरे की परछाईं बना सकते हैं। परंतु अंधकार सर्वव्यापी है, यह हर जगह उपस्थित है। संसार के अपरिपक्व मस्तिष्कों ने सदा अंधकार को एक शैतान के रूप में चित्रित किया है। पर जब आप दिव्य शक्ति को सर्वव्यापी कहते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से इसे अंधकार कह रहे होते हैं, क्योंकि सिर्फ अंधकार सर्वव्यापी है। यह हर ओर है। इसे किसी के भी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश सदा किसी ऐसे स्त्रोत से आता है, जो स्वयं को जला रहा हो। इसका एक आरंभ व अंत होता है। यह सदा सीमित स्त्रोत से आता है। अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं, तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं। भारतीय संस्कृति में, सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ केवल आपको बचाने या आपकी बेहतरी के संदर्भ में नहीं थीं। सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ कहती हैं, “हे ईश्वर, मुझे नष्ट कर दो ताकि मैं आपके समान हो जाऊँ।“ तो जब हम शिवरात्रि कहते हैं जो कि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिन है, तो यह एक ऐसा अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को विसर्जित कर के, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करे, जो प्रत्येक मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।


महाशिवरात्रि – जागृति की रात

महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है, जब आप स्वयं को, हर मनुष्य के भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं, जो कि सारे सृजन का स्त्रोत है। एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी ओर वे सबसे अधिक करुणामयी भी हैं। वे बहुत ही उदार दाता हैं। यौगिक गाथाओं में वे, अनेक स्थानों पर महाकरुणामयी के रूप में सामने आते हैं। उनकी करुणा के रूप विलक्षण और अद्भुत रहे हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि 2019 कुछ ग्रहण करने के लिए भी एक विशेष रात्रि है। यह हमारी इच्छा तथा आशीर्वाद है कि आप इस रात में कम से कम एक क्षण के लिए उस असीम विस्तार का अनुभव करें, जिसे हम शिव कहते हैं। यह केवल एक नींद से जागते रहने की रात भर न रह जाए, यह आपके लिए जागरण की रात्रि होनी चाहिए, चेतना व जागरूकता से भरी एक रात!

Tuesday, February 14, 2023

भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग


भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

सनातन धर्म में भगवान शिव के अनेक भक्त हैं. जो अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए कई जतन करते हैं. भारत देश में 12 अलग-अलग जगहों पर 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई है. जो सनातन धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. इन्हीं में से एक है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग. जिससे जुड़े कई रोचक तथ्य हैं.

हाइलाइट्स

भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर का पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

हिंदू धर्म में भगवान शिव पर आस्था रखने वाले सभी भक्तों के लिए भगवान भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंग का अपना एक अलग महत्व है. इन्हीं 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग. मान्यताओं के अनुसार इन 12 ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव ने स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिए थे. इसके बाद इन 12 जगहों में 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई. भारतवर्ष के इन सभी 12 ज्योतिर्लिंगों की अपनी अलग-अलग विशेषताएं हैं. इन सभी मंदिरों में सावन के महीने में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनके भक्तों की भारी भीड़ आती है.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे अंतिम ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है. आज हमें ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में कुछ रोचक तथ्य.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी रोचक बातें

-भारतवर्ष के इतिहास से पता चलता है कि भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर का पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था. इसके अलावा इस मंदिर से महज आधा किलोमीटर की दूरी पर एलोरा की विश्व प्रसिद्ध गुफाएं भी मौजूद है.

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से सुख और संतान की प्राप्ति होती है. इस मंदिर में तीन द्वार हैं और गर्भगृह के सामने एक बड़ा सा मंडप है. जिसे सभा मंडप कहा गया है. यह मंडप पाषाण स्तंभों पर आधारित है. इन स्तंभों पर सुंदर चित्रण और नक्काशी की हुई है. सभा मंडप में नंदी की मूर्ति भी स्थापित है.

हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार घुश्मा नामक युवती की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे यहां दर्शन दिए थे और संतान सुख का वरदान भी दिया था. माना जाता है कि यहां निसंतान जोड़ों की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है. भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के मंदिर का व्यास 240×185 फीट में बना हुआ है. मान्यताओं के अनुसार यह भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग भी माना गया है. इसके अलावा इस मंदिर में भगवान विष्णु के 10 अवतार का चित्रण भी मिलता है. मंदिर का मुख्य प्रांगण 24 दिनों में बनाया गया है. इन पदों पर प्राचीन समय के शिलालेख और हस्त नीतियां दिखाई पड़ती हैं. इस मंदिर का गर्भ ग्रह 17×17 फीट में फैला हुआ है और इसके सामने नंदीश्वर की मूर्ति भी विराजमान है.

ॐ नमः शिवाय।।🙏🏼🙏🏼✨✨

Monday, February 13, 2023

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी

 

श्री शैल पर्वत पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं मल्लिकार्जुन.

भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है. मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव एक लोटे जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं. आज की इस कड़ी में हम जानेंगे भगवान शिव के एक और ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन के बारे में.

हाइलाइट्स

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है.

यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है,

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

सनातन धर्म में भगवान शिव को मानने और उनकी आराधना करने वाले अनेक भक्त हैं. मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव की श्रद्धा भाव के साथ पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है. भारत वर्ष में भगवान शिव के मुख्य रूप से 12 ज्योतिर्लिंग हैं. जो देश के कोने-कोने में भव्य मंदिरों के रूप में स्थापित हैं. भगवान शिव के इन 12 ज्योतिर्लिंगों का अपना एक अलग महत्व है.

इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए भारतवर्ष के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं. इन्हीं ज्योतिर्लिंगों में से एक है मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग जिसके बारे में अधिक जानकारी दे रहे हैं ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का महत्व

-मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है. भारतवर्ष में इस ज्योतिर्लिंग को दक्षिण भारत का कैलाश भी कहा गया है, मान्यताओं के अनुसार इसके दर्शन मात्र से ही सभी लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं, हिंदू धर्म पुराणों में बताया गया है कि मल्लिका अर्जुन ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त रूप से दिव्य ज्योतियाँ विराजमान है.

हिंदू धर्म में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को बहुत ही पवित्र ज्योतिर्लिंग माना गया है. श्री शैल पर्वत पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. ऐसा माना जाता है कि इस पर्वत पर जो भी व्यक्ति भगवान भोलेनाथ की पूजा करता है उसे अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है और उसकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं.

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास उस पौराणिक हिंदू कथा से जुड़ा हुआ है जब भगवान शिव के दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश में इस बात की शर्त लगी कि उनमें से बड़ा कौन है. भगवान कार्तिकेय का मानना था कि वे भगवान गणेश से बड़े हैं. जबकि गणेश जी कहते थे कि वह कार्तिकेय से बड़े हैं. इस बात पर माता पार्वती और भगवान शिव ने कार्तिकेय और गणेश से कहा कि जो भी पृथ्वी की परिक्रमा लगाकर सबसे पहले हमारे पास आ जाएगा वही बड़ा होगा. इस बात को सुनकर कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल गए. लेकिन चूहे की सवारी करने वाले भगवान गणेश के लिए यह काम मुश्किल था भगवान गणेश बुद्धि के दाता माने जाते हैं. इसलिए उन्होंने अपनी बुद्धि का उपयोग किया और माता पार्वती और पिता शिव की सात बार परिक्रमा की इस तरह उन्हें पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल के अधिकारी बन गए.

जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा कर वापस आए तब यह सब देख कर चौक गए. गुस्से में विशाल पर्वत की ओर चल दिए कार्तिकी को मनाने के लिए माता पार्वती भी पर्वत पर पहुंची इसके बाद भगवान शिव ने वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर अपने दर्शन दिए. तभी से शिव का यह ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ.

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लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...