Saturday, March 11, 2023

कलयुग के दानवीर - Devotional Story

कलयुग के दानवीर

यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज जैसे भागवताचार्य भी हुए हैं जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे , मात्र तुलसी पत्र लेते थे।

जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, उसमें जो भी दान दक्षिणा चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे। कोई ट्रस्ट बनाया नहीं और किसी को शिष्य भी बनाया नहीं।

अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे।

उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान किए गए थे।-स्वंय कुछ नहीं लिया|

डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी। प्रथम-रात के समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा था- 'देवी मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ 108 भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे'।

इसके बाद जहाँ -जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती।108 भागवत पूर्ण होने में करीब सात वर्ष बीत गए।

तब डोंगरे जी महाराज पत्नी से बोले-' अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें'।

इस पर उनकी पत्नी ने कहा,' आपके श्रीमुख से 108 भागवत श्रवण करने के बाद मैंने गोपाल को ही अपना पुत्र मान लिया है, इसलिए अब हमें संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है'।

धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका कृष्ण प्रेम।

डोंगरे जी महाराज की पत्नी आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत रस बरसाते थे।

पत्नी की मृत्यु के पांच दिन पश्चात उन्हें इसका पता चला।

वे अस्थि विसर्जन करने गए, उनके साथ मुंबई के बहुत बड़े सेठ थे- रतिभाई पटेल जी |

उन्होंने बाद में बताया कि डोंगरे जी महाराज ने उनसे कहा था ‘कि रति भाई मेरे पास तो कुछ है नहीं और अस्थि विसर्जन में कुछ तो लगेगा। क्या करें’ ?

फिर महाराज आगे बोले थे, ‘ऐसा करो, पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल- पड़ा होगा उसे बेचकर जो मिलेगा उसे अस्थि विसर्जन क्रिया में लगा देते हैं’।

सेठ रतिभाईपटेल ने रोते हुए बताया था....

जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वह महापुरुष कह रहा था कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिए पैसे नहीं हैं।

हम उसी समय मर क्यों न गए l

फूट फूट कर रोने के अलावा मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था।

ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटि-कोटि नमन भी कम है 🙏

Thursday, March 9, 2023

मोक्ष का अधिकारी कौन- Devotional Story

मोक्ष का अधिकारी कौन

ब्रह्माजी के कुल में एक बड़े ही धर्मात्मा और दानी राजा का जन्म हुआ. उनका नाम वसु था. 

वसु जहां से भी सम्भव हो ज्ञान इकट्ठा करते रहते थे इसलिये अपने ज्ञान और जानकारी के लिए भी बहुत प्रसिद्ध थे.

एक दिन वसु ब्रह्माजी से मिलने पहुंचे. ब्रह्माजी के भवन में देवों की सभा चल रही है. इतने में रैभ्य मुनि आ वहां गए. 

रैभ्य देवगुरू वृह्स्पति से मिलने आये थे. वसु उनके साथ वृहस्पति के घर चले गए.

रैभ्य ने वृहस्पति से पूछा- मेरी एक शंका का समाधान करें. क्या अज्ञानी को भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है या बिना ज्ञान प्राप्त किए मोक्ष हो ही नहीं सकता ? 

बृहस्पति हंसने लगे... फिर बोले इस संदर्भ में ब्राह्मण और शिकारी की एक कथा सुनाता हूं. 

अत्रि कुल में जन्मे ब्राह्मण संयमन तथा नीच कर्म करने वाले बहेलिए निष्ठुरक की कथा आपका संदेह दूर करने में सहायता करेगी.

तीनों पहर पूजा पाठ करने वाले संयमन गंगा नहाने गए. वहां एक शिकारी दिखा. 

संयमन बोले- शिकारी यह जीवहत्या का काम ठीक नहीं इसे छोड़ दो. यह सुनकर शिकारी मुस्कराने लगा.

इससे पहले कि संयमन कुछ बोलते शिकारी बोल पड़ा- सभी प्राणियों में आत्मा के रूप में भगवान बसते हैं. 

सच्चे पुरुष को चाहिए कि वह इस अहंकार को त्याग दे कि मैं कर्ता हूं. कोई कुछ नहीं करता. जो करता है सब ईश्वर करता है.

सब प्रभु की लीला है तो ऐसे में क्या शिकार और क्या शिकारी. मारने वाला भी वही मरने वाला भी वही. आप किसी को हीन न समझें.

शिकारी होकर ऐसी ज्ञान की बाते कर रहा है यह सुनकर ब्राह्मण संयमन आश्चर्य में बोला- तुम कौन हो जो इतने तर्क के साथ अपनी बात रख रहे हो. 

शिकारी ने कोई ज़वाब नहीं दिया. वह लोहे का एक जाल लेकर आया. जाल को सूखी लकड़ियों के ऊपर डाल दिया. 

फिर संयमन के हाथ एक लुकाठी देकर कहा- विप्रवर इन लकड़ियों में आग लगा दें.

संयमन के आग लगाने की देर थी. देखते ही देखते सूखी लकड़ियां धधककर जलने लगीं. जाल के विभिन्न छेदों से अग्नि की ज्वाला लहराने लगी.

शिकारी ने आग की ओर इशारा करते हुये कहा- विप्रवर आप इन छेदों में से निकलती आग की कोई एक ज्वाला या अग्निपुंज उठा लें क्योंकि अब मैं आग बुझाउंगा.

शिकारी ने आग पर जल फेंका तो पल भर में ही धधकती आग शांत हो गयी. शिकारी बोला- ऋषिवर जो आग आपने चुनी थी वह मुझे दे दें. उसी के सहारे मैं अपना जीवन यापन करुंगा.

संयमन ने आग पर निगाह डाली पर वहां अब आग कहां ! आग की सभी ज्वालायें कब की शांत हो चुकी थीं. संयमन आंख मूंद कर शांत बैठ गये.

शिकारी ने कहा- यही हाल संसार का है. सबके मूल में भगवान की ही जोत जल रही है. 

यदि व्यक्ति अपने स्वाभाविक धर्म का अनुसरण करते हुए हृदय को परमात्मा से जोड़कर कोई भी शुभ-अशुभ कार्य करता है.. 

फिर उस कार्य को प्रभु को समर्पित कर देता है तो उसे न तो कोई दुःख होता है न ही वह कर्म संबंधी पाप पुण्य के चक्कर में पड़ता है.

इतना कहना भर था कि आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी. रत्नों से सजे धजे कई विमान आसपास उतर आए. 

शिकारी निष्ठुरक अद्वैत ब्रह्म का उपासक था सो उसने योग विद्या से कई शरीर बना लिए तथा अनेक विमानों में बैठ स्वर्ग चला गया.

वृहस्पति बोले- तो हे राजन वसु और मुनिवर रैभ्य, इससे यह सिद्ध होता है कि अपने वर्ण और आश्रम के अनुरूप कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने के बाद मुक्ति का अधिकारी हो जाता है.

((((((( जय जय श्री राधे )))))))

RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI 

🙏पुण्य का फल 🙏 Devotional Story

       
 🙏पुण्य का फल 🙏
 एक था मजदूर। मजदूर तो था, साथ-ही-साथ किसी संत महात्मा का प्यारा भी था। सत्संग का प्रेमी था। उसने शपथ खाई थी! मैं उसी का बोझ उठाऊँगा, उसी की मजदूरी करूँगा, जो सत्संग सुने अथवा मुझे सुनाये. प्रारम्भ में ही यह शर्त रख देता था। जो सहमत होता, उसका काम करता।

        एक बार कोई सेठ आया तो इस मजदूर ने उसका सामान उठाया और सेठ के साथ वह चलने लगा। जल्दी-जल्दी में शर्त की बात करना भूल गया। आधा रास्ता कट गया तो बात याद आ गई। उसने सामान रख दिया और सेठ से बोला:- “सेठ जी ! मेरा नियम है कि मैं उन्हीं का सामान उठाऊँगा, जो कथा सुनावें या सुनें। अतः आप मुझे सुनाओ या सुनो।

       सेठ को जरा जल्दी थी। वह बोला- “तुम ही सुनाओ।” मजदूर के वेश में छुपे हुए संत की वाणी से कथा निकली। मार्ग तय होता गया। सेठ के घर पहुंचे तो सेठ ने मजदूरी के पैसे दे दिये। मजदूर ने पूछा:-        क्यों सेठजी ! सत्संग याद रहा?” “हमने तो कुछ सुना नहीं। हमको तो जल्दी थी और आधे रास्ते में दूसरा कहाँ ढूँढने जाऊँ? इसलिए शर्त मान ली और ऐसे ही ‘हाँ… हूँ…..’ करता आया।

         हमको तो काम से मतलब था, कथा से नहीं।”भक्त मजदूर ने सोचा कि कैसा अभागा है ! मुफ्त में सत्संग मिल रहा था और सुना नहीं ! यह पापी मनुष्य की पहचान है। उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे. अचानक उसने सेठ की ओर देखा और गहरी साँस लेकर कहा:- “सेठ! कल शाम को सात बजे आप सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाओगे। अगर साढ़े सात बजे तक जीवित रहें तो मेरा सिर कटवा देना।”जिस ओज से उसने यह बात कही, सुनकर सेठ काँपने लगा। भक्त के पैर पकड़ लिए। भक्त ने कहा:- “सेठ! जब आप यमपुरी में जाएँगे तब आपके पाप और पुण्य का लेखा जोखा होगा, हिसाब देखा जाएगा।   

 आपके जीवन में पाप ज्यादा हैं, पुण्य कम हैं। अभी रास्ते में जो सत्संग सुना, थोड़ा बहुत उसका पुण्य भी होगा। आपसे पूछा जायेगा कि कौन सा फल पहले भोगना है? पाप का या पुण्य का ? तो यमराज के आगे स्वीकार कर लेना कि पाप का फल भोगने को तैयार हूँ पर पुण्य का फल भोगना नहीं है, देखना है। पुण्य का फल भोगने की इच्छा मत रखना। मरकर सेठ पहुँचे यमपुरी में।

         चित्रगुप्तजी ने हिसाब पेश किया। यमराज के पूछने पर सेठ ने कहा:- “मैं पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता और पाप का फल भोगने से इन्कार नहीं करता। कृपा करके बताइये कि सत्संग के पुण्य का फल क्या होता है? मैं वह देखना चाहता हूँ।” पुण्य का फल देखने की तो कोई व्यवस्था यमपुरी में नहीं थी। पाप- पुण्य के फल भुगताए जाते हैं, दिखाये नहीं जाते। यमराज को कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा मामला तो यमपुरी में पहली बार आया था।

      यमराज उसे ले गये धर्मराज के पास। धर्मराज भी उलझन में पड़ गये। चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज तीनों सेठ को ले गये। सृष्टि के आदि परमेश्वर के पास । धर्मराज ने पूरा वर्णन किया।

     परमपिता मंद-मंद मुस्कुराने लगे। और तीनों से बोले:- “ठीक है. जाओ, अपना-अपना काम सँभालो।” सेठ को सामने खड़ा रहने दिया। सेठ बोला:- “प्रभु ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं है, अपितु देखना है।”

        प्रभु बोले:- “चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज जैसे देव आदरसहित तुझे यहाँ ले आये और तू मुझे साक्षात देख रहा है, इससे अधिक और क्या देखना है?”

     *एक घड़ी आधी घड़ी,आधी में पुनि आध। तुलसी सत्संग साध की, हरे कोटि अपराध।*। 

      *जो चार कदम चलकर के सत्संग में जाता है, तो यमराज की भी ताकत नहीं उसे हाथ लगाने की*।

      सत्संग-श्रवण की महिमा इतनी महान है. सत्संग सुनने से पाप-ताप कम हो जाते हैं। पाप करने की रूचि भी कम हो जाती है। बल बढ़ता है दुर्बलताएँ दूर होने लगती हैं।

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...