Tuesday, May 2, 2023

श्री हनुमान जी के अवतार

श्री हनुमान जी के अवतार

🚩जानें किस मूर्ति से कौन सी मनोकामना होती है पूरी।

🍁1. पूर्वमुखी हुनमान जी - पूर्व की ओर मुख वाले बजरंबली को वानर रूप में पूजा जाता है। इस रूप में भगवान को बेहद शक्तिशाली और करोड़ों सूर्य के तेज के समान बताया गया है। शत्रुओं के नाश के बजरंगबली जाने जाते हैं। दुश्मन अगर आप पर हावी हो रहे हैं तो पूर्वमुखी हनुमान की पूजा शुरू कर दें।

🍁2. पश्चिममुखी हनुमान जी - पश्चिम की ओर मुख वाले हनुमानजी को गरूड़ का रूप माना जाता है। इसी रूप को संकटमोचन का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ अमर है उसी के समान बजरंगबली भी अमर हैं। यही कारण है कि कलयुग के जाग्रत देवताओं में बजरंगबली को माना जाता है।

🍁3. उत्तरामुखी हनुमान जी - उत्तर दिशा की ओर मुख वाले हनुमान जी की पूजा शूकर के रूप में होती है। एक बात और वह यह कि उत्तर दिशा यानी ईशान कोण देवताओं की दिशा होती है। यानी शुभ और मंगलकारी। इस दिशा में स्थापित बजरंगबली की पूजा से इंसान की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। इस ओर मुख किए भगवान की पूजा आपको धन-दौलत, ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा, लंबी आयु के साथ ही रोग मुक्त बनाती है।

🍁4. दक्षिणामुखी हनुमान जी - दक्षिणमुखी हनुमान जी को भगवान नृसिंह का रूप माना जाता है। दक्षिण दिशा यमराज की होती है और इस दिशा में हनुमान जी की पूजा से इंसान के डर, चिंता और कठिनाईयों से मुक्ति मिलती है। दक्षिणमुखी हनुमान जी बुरी शक्तियों से बचाते हैं।

🍁5.ऊर्ध्वमुख - इस ओर मुख किए हनुमान जी को ऊर्ध्वमुख रूप यानी घोड़े का रूप माना गया है। इस स्वरूप की पूजा करने वालों को दुश्मनों और संकटों से मुक्ति मिलती है। इस स्वरूप को भगवान ने ब्रह्माजी के कहने पर धारण कर हयग्रीव दैत्य का संहार किया था।

🍁6. पंचमुखी हनुमान - पंचमुखी हनुमान के पांच रूपों की पूजा की जाती है। इसमें हर मुख अलग-अलग शक्तियों का परिचायक है। रावण ने जब छल से राम लक्ष्मण को बंधक बना लिया था तो हनुमान जी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण कर अहिरावण से उन्हें मुक्त कराया था। पांच दीये एक साथ बुझाने पर ही श्रीराम-लक्षमण मुक्त हो सकते थे इसलिए भगवान ने पंचमुखी रूप धारण किया था। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख में वह विराजे हैं।

🍁7. एकादशी हनुमान - ये रूप भगवान शिव का स्वरूप भी माना जाता है। एकादशी रूप रुद्र यानी शिव का 11वां अवतार है। ग्यारह मुख वाले कालकारमुख के राक्षस का वध करने के लिए भगवान ने एकादश मुख का रुप धारण किया था। चैत्र पूर्णिमा यानी हनुमान जयंती के दिन उस राक्षस का वध किया था। यही कारण है कि भक्तों को एकादशी और पंचमुखी हनुमान जी पूजा सारे ही भगवानों की उपासना समान माना जाता है।

🍁8. वीर हनुमान - हनुमान जी के इस स्वरूप की पूजा भक्त साहस और आत्मविश्वास पाने के लिए करते हें। इस रूप के द्वारा भगवान के बल, साहस, पराक्रम को जाना जाता है अर्थात तो भगवान श्रीराम के काज को संवार सकता है वह अपने भक्तों के काज और कष्ट क्षण में दूर कर देते हैं।

🍁9. भक्त हनुमान - भगवान का यह स्वरूप श्री रामभक्त का है। इनकी पूजा करने से आपको भगवान श्रीराम का भी आर्शीवाद मिलता है। बजरंगबली की पूजा अड़चनों को दूर करने वाली होती है। इस पूजा से भक्तों में एकाग्रता और भक्ति की भावना जागृत होती है।

🍁10. दास हनुमान - बजरंबली का यह स्वरूप श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति को दिखाता है। इस स्वरूप की पूजा करने वाले भक्तों को धर्म कार्य और रिश्ते-नाते निभाने में निपुणता हासिल होती है। सेवा और समर्पण का भाव भक्त इस स्वरूप के द्वारा ही पाते हैं।

🍁11. सूर्यमुखी हनुमान - यह स्वरूप भगवान सूर्य का माना गया है। सूर्य देव बजरंगबली के गुरु माने गए हैं। इस स्वरूप की पूजा से ज्ञान, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और उन्नति का रास्ता खुलता है। क्योंकि श्री हनुमान के गुरु सूर्यदेव अपनी इन्हीं शक्तियों के लिए जाने जाते हैं।

#श्री राम जय राम जय जय राम#

 #ॐ हनुमते दुःखभंजन,#अंजनिसुत केसरीनंदन#  #रामदूत संकटमोचन,# 

!! जय श्री राम!!

ईश्वर का अस्तित्व तुम्हें साकार नजर आ जाएगा।

श्रद्धा से नतमस्तक हो आधार नजर आ जाएगा।।

!! जय श्री राम !!


Sunday, April 30, 2023

ब्रह्मगिरीपर्वत का रहस्य

 "ब्रह्मगिरीपर्वत"

          वराहपुराण में और पद्मपुराण में ऐसा लिखा है कि पहले ब्रह्मा जी ने 60 हजार वर्ष तक तप किया फिर भी गोपियों की रज नहीं मिली। उसके बाद सतयुग के अन्त में ब्रह्मा जी ने फिर तप किया भगवान ने कहा, कि तुम क्या चाहते हो ? 

          ब्रह्मा जी बोले, कि सब गोपियों की रज मिल जाये व माधुर्यमयी लीलाएँ देखने को मिले। 

          भगवान ने कहा, कि वहाँ पुरुषों का प्रवेश नहीं है। 

          ब्रह्मा जी बोले, फिर ? 

          भगवान ने कहा, कि तुम पर्वत बन जाओ। 

          ब्रह्मा जी बोले, कहाँ ? 

          भगवान ने कहा,  कि तुम ब्रज में चले जाओ। 

          ब्रह्मा जी ने कहा, कि ब्रज तो बहुत बड़ा है, कहाँ जायें ? 

          भगवान बोले, कि वृषभानुपुर यानि बरसाना चले जाओ। वहाँ पर्वत बन जाना, अपने आप सब लीला मिल जायेगी व गोपियों की चरण रज भी मिल जायेगी। बरसाना वहाँ नित्य श्री राधा रानी के चरण मिलेंगे। 

          तब ब्रह्मा जी यहाँ आकर पर्वत बन गए। 

          एक कथा आती है बरसाने के पर्वतों के बारे में कि जब भगवान सती अनुसुइया की परीक्षा लेने गये थे तो वहाँ उसने ब्रह्मा विष्णु शिव को श्राप दिया कि तुमने बड़ा अमर्यादित व्यवहार किया है इसीलिए जाओ पर्वत बन जाओ। तो तीनों देवता पर्वत बन गये और उनका नाम त्रिंग हुआ। 

          जब श्री राम जी का सेतु बंधन हो रहा था तो पर्वत लाये जा रहे थे। त्रिंग को जब हनुमान जी ला रहे थे तो आकाशवाणी हुई कि अब पर्वत मत लाओ क्योंकि सेतु बंधन हो चुका है। तो जब हनुमान जी ने उसे यहाँ पर रख दिया तो गिरिराज जी बोले कि हनुमान जी हम तुमको श्राप दे देंगे। हे वानर राज तुमने हमारा प्रभु से मिलन नहीं होने दिया। तो हनुमान जी ने प्रभु से प्रार्थना की। तब राम जी ने कहा कि मैं स्वयं श्री कृष्ण के रूप में उनको अपने हाथों से धारण करूँगा जब की औरों को तो सिर्फ चरण स्पर्श ही दूँगा। 

          एक पुराण में लिखा है कि स्वयं राम जी आये और उन्होंने जो त्रिंग थे, ब्रह्मा विष्णु शिव, इन तीनों को अलग-अलग करके यहाँ स्थापित किया। ‘नन्दगाँव’ में शिव जी को स्थापित किया, ’नन्दीश्वर‘ के रूप में, और ‘गोवर्धन‘ में विष्णु को ‘गिरिराज’ जी के रूप में, ब्रह्मा जी यहाँ ‘बरसाने’ में स्थापित किये ‘ब्रह्मगिरी पर्वत‘ के रूप में। ब्रह्मगिरी के चार शिखर हैं, चार गढ़ है, मानगढ़, दानगढ़, भानुगढ़, विलासगढ़। ये जितने शिखर हैं ये ब्रह्मा जी के मस्तक हैं।

                             "जय जय श्री राधे"


Friday, April 21, 2023

माता शबरी की प्रतीक्षा

 शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।


शबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी।


महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया "पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।"


अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा- कब आएंगे..?


महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे। महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया।


 आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए।ये उलट कैसे हुआ। गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ???


महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका।

महर्षि मतंग बोले- 

पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ।

अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ।

उनका कौशल्या से विवाह होगा।फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। 

फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा।फिर प्रतीक्षा..


फिर उनका विवाह कैकई से होगा।फिर प्रतीक्षा.. 


फिर वो जन्म लेंगे, फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा।फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा। तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे।तुम उन्हें कहना आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।


शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।


वह फिर अधीर होकर पूछने लगी- "इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव???"


महर्षि मतंग बोले- "वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे।यह भावी निश्चित है। लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे "अवश्य"...!


जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे। इसलिए प्रतीक्षा करना।वे कभी भी आ सकते है। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।"


शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी।वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। 


हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती।


कभी भी आ सकतें हैं।

हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा। शबरी बूढ़ी हो गई।लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही।


और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी।


गुरु का कथन सत्य हुआ।भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।


ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो। एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे-


"कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..?"


राम मुस्कुराए- "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..?"


"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।


राम ने कहा- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है।”


"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।


”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...!” (वानरी भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। ”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी,   और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...।" (मार्जारी भाव)


राम मुस्कुराकर रह गए!!


भीलनी ने पुनः कहा- "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं!" तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..?”


राम गम्भीर हुए और कहा-


भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने आया है..?”


रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है।


राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।”


"जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"


राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि "शासन/प्रशासन और सत्ता" जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है।”

(अंत्योदय)


राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!


माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।


राम ने फिर कहा-


राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।”


"राम राजमहल से निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।”


"राम निकला है, ताकि “भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए।”


और


"राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है।”


शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा-  "बेर खाओगे राम..?”


राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"


शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये।


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु..?” 


"यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”


सबरी मुस्कुराईं, बोली-   "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"


मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन!

🙏🏻💐 #जय_श्री_राम💐🙏

🚩🙏#सनातन_धर्म_सर्वश्रेष्ठ_है 🚩🙏

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...