Friday, February 10, 2023

भारत के नागा साधु

नागा साधु

बात ज्यादा पुरानी नहीं है अंग्रेजो के ज़माने में एक दंगा हुआ था श्री राम जन्मभूमि को ले लेकर और फैज़ाबाद की तरफ से मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था ।तब दंगे के बीच सबने देखा कि हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों से 6 फुट से ज्यादा ऊंचा विशालकाय नागा साधु हाथ मे तलवार लिए उतरा और दंगाई भीड़ पे अकेले टूट पड़ा और गाजर मूली की तरहः काटता हुआ फैज़ाबाद की तरफ निकल गया ।हनुमान गढ़ी में रहने वाले अन्य महंत पुजारी नागा भी हैरान रह गए क्योंकि किसी ने उस नागा साधु को न उस दिन के पहले देखा था न उस दिन

के बाद देखा ।लेकिन उस अकेले नागा ने ऐसी मार काट की थी कि फैज़ाबाद तक सड़क पे दंगाइयों की लाशें पड़ी थी और दंगा बंद हो गया था ।अयोध्या शहर के कोतवाल हनुमान जी और अयोध्या की सुरक्षा का जिम्मा उनके ऊपर है और जब अयोध्या पर संकट आता है तो वो किसी न किसी साधु रूप में आते है 16 दिसम्बर वाले दिन बाबरी ढांचे के चारो तरफ प्रशाशन ने कई स्तर की बैरिकेड लगाया हुआ था और कार सेवक अंदर नहीं जा पा रहे थे ।तभी एक नागा साधु एक सरकारी बस स्टार्ट कर के तेज़ी से बस ले कर बैरिकेड के एक के बाद एक स्तर तोड़ता हुआ अंदर घुसता गया ।उसके पीछे भीड़ घुस गई और वो नागा उस भीड़ में गायब हो गया ।ये घटना फ़ोटो और वीडियो में रिकॉर्ड हुई थी अखबारों में भी छपी लेकिन वो नागा कभी दुबारा नही दिखा लेकिन उसने ढांचा गिराने के लिए कारसेवकों के लिए रास्ता खोल दिया था प्रशाशन देखता रह गया और कुछ नही कर सका था ।अयोध्या में हनुमान जी का किला है हनुमान गढ़ी और देश भर के सभी प्रमुख हनुमान मंदिरों का मुख्यालय भी है l

जय जय श्री राम


Wednesday, February 8, 2023

राम सेतु कथा

 राम सेतु कथा

रामसेतु रामायण काल में लंका विजय के लिए बनाया गया था.

रामायण काल में लंका पर विजय के लिए नल और नील ने रामसेतु बनाया था. उनको श्राप मिला था, जिस कारण से पानी में फेंके गए पत्थर डूबते नहीं थे. उनको यह श्राप बचपन में मिला था. पढ़ें यह रोचक कथा.

रामेश्वरम स्थित रामसेतु रामायण काल में लंका विजय के लिए बनाया गया था.

इस सेतु के निर्माण में विश्वकर्मा के पुत्र नल व नील की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.

बचपन में मिला एक श्राप इनके लिए सेतु निर्माण में वरदान साबित हुआ था.

राम सेतु कथा

रामसेतु के बारे में तो सभी जानते हैं. रामायण काल में यह सेतु यानी पुल लंका विजय के लिए भगवान राम ने बनवाया था. इस सेतु के निर्माण में वानर नल व नील की अहम भूमिका रही थी, जिनके हाथ से छुए हुए पत्थरों पर भगवान राम का नाम लिखने पर वे समुद्र में नहीं डूबे और उसी वजह से राम सेतु बन पाया. क्या आप जानते हैं नल व नील के हाथ से ही ये सेतु क्यों बनवाया गया? शायद नहीं! ऐसे में आज हम आपको उस श्राप की कथा बताते हैं, जो रामसेतु निर्माण में वरदान साबित हुआ.

नल-नील के श्राप की कथा
पंडित रामचंद्र जोशी के अनुसार, नल और नील भगवान विश्वकर्मा के पुत्र थे. ये बचपन में स्वभाव से बहुत ही नटखट थे. इनका ज्यादातर समय ऋषियों के आश्रम में ही बीतता था. अपने बाल स्वभाव से वे ऋषियों को खूब परेशान करते. जब भी ऋषि- मुनि ध्यान व तप करते तो दोनों भाई चुपके से दबे पांव आकर उनकी मूर्ति व अन्य सामान पानी में फेंक देते. दोनों को बालक समझ व उन पर स्नेह होने के कारण ऋषि उन्हें कभी कुछ नहीं कहते. इसी वजह से उनका उपद्रव लगातार बढ़ता ही गया.

ऋषियों का यही श्राप रामसेतु के निर्माण के समय वरदान साबित हुआ. जब लंका विजय के लिए समुद्र पार करना जरूरी हुआ तब भगवान राम ने समुद्र देव का आह्वान किया था. तब समुद्र ने प्रगट होकर नल-नील के शाप का जिक्र करते हुए सेतु का उपाय सुझाया. इसके बाद वानर सेना की सहायता से नल व नील ने पत्थरों पर भगवान राम का नाम लिखकर उनसे लंका तक सेतु बना दिया. यही सेतु रामसेतु कहलाता है.

जब भगवान राम के बार-बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव...

जब भगवान राम के बार-बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव...


राम-केवट संवाद

नदी पार करने के लिए भगवान राम ने केवट से नांव मंगाई , केवट के चरण रज का हवाला देते हुए नांव ना लाने के लिए बोला जिसपर भगवान उसकी इच्छा समझ गए और फिर उपाय स्वरूप केवट ने राम जी के चरण धोए और उन्हें पार उतारा.

भगवान राम ने केवट से नांव मंगाई

केवट के चरण रज का हवाला देते हुए नांव ना लाने के लिए बोला

उपाय स्वरूप केवट ने राम जी के चरण धोए और उन्हें पार उतारा

भगवान श्री राम, भगवान होने के साथ साथ एक राजा भी थे और राजा के आदेश का पालन करना प्रजा का परमधर्म होता है परंतु क्या आप जानते हैं वह प्रसंग जब राम के बार बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव…? अगर नहीं! तो आइए हम बताते है आपको इस मार्मिक प्रसंग के बारे में. रामचरित्रमानस के अनुसार जब पिता दशरथ ने भगवान श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया तो भगवान श्री राम, भाई लक्ष्मण एवं पत्नी सीता के साथ अयोध्या छोड़ वन को चल दिए परंतु रास्ते में नदी पड़ती है जिसे पार करने के लिए श्री राम केवट को बुलाते हैं.

कौन थे केवट…?
रामचरित्रमानस में वर्णित सभी पात्रों की अपनी अलग ही महिमा है परंतु उन सभी श्रेष्ठ पात्रों में से कुछ सर्वश्रेष्ठ पात्र भी हैं जैसे केवट. केवट को कोई पूजा, पाठ, यज्ञ, होम आदि कुछ नहीं आता था, परंतु यह उनके मन की पवित्रता एवं पुण्यकर्मों का फल ही था जो भगवान श्री राम स्वय चलकर उनतक पहुंचे और फिर एक नदी के केवट ने भवसागर के केवट को नाव से गंगा के पार उतारा.

जब श्री राम ने मांगी केवट से नांव,
भगवान राम के नांव मांगने पर केवट ने उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारा और वह जान गया कि यही भगवान श्री राम ही हैं, परंतु उसने नांव लाने से मना कर दिया जिसपर भगवान श्री राम ने नांव ना लाने की वजह पूछी, केवट ने उत्तर दिया और बोला, “प्रभु मैं आपकी लीलाओं से अच्छी तरह अवगत हू, मैं जनता हू आपके चरणों की रज के जादू को जो एक पत्थर को सुंदर नारी बना सकता है. अगर आपकी जादू भरी पद रज एक पाषाण जैसी कठोर वस्तु को नारी बना सकती है तो यह तो मात्र लकड़ी से बनी नांव है इसका तो क्या ही हाल होगा…?”

जब केवट ने बताया उपाय,
यह सब सुन स्वभाव से उग्र लक्ष्मण जी क्रोधित हो केवट को डांटने-फटकार्ने लगे, जिसपर भगवान राम ने उन्हें शांत किया और मुस्कुराकर केवट से बोले, “केवटराज! कोई तो उपाय होगा जिससे हमें आप पार उतार सके…?”
यह सुन केवट बोले, “हे प्रभु! आपको नांव पर चढ़ाने के लिए पहले मुझे आपके चरणों को धोना पड़ेगा.”

केवट चाहते थे भगवान का चरणामृत पीना,
केवट के इन वचनो को सुनकर भगवान श्री राम उनकी इच्छा को समझ गए और हामी भरते हुए सीता एवं लक्ष्मण जी की ओर देखकर मुस्कुराने लगे. यह सुन केवट अत्यंत प्रसन्न हुए और उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे, वे जाकर एक पात्र में गंगाजल लाए और बड़े ही प्रेम से प्रभु के चरण कमल धोकर, चरणामृत का पान कर कृतार्थ हुए. प्रभु के चरणामृत से उन्होंने अपने पुरखो को भी तारा एवं खुद भी मोक्ष के अधिकारी भी बन गए.

केवट ने लगाया श्री राम, सीता और लक्ष्मण जी को पार,
इसके बाद केवट ने उन तीनो को नांव में विराजमान करा, प्रभु की रसमाधुरी का पान करते हुए उन्हे पार उतार दिया. पर उतरने के बाद केवट से प्रभु राम ने उतराई यानि नांव के किराए के बारे में पूछा जिसपर केवट मे व्याकुल हो कहा, “प्रभु मैंने आज आपको इस नदी से पार लगाया है, कल जब में आपके लोक में आऊगा तो कृपा कर आप मुझे भवसागर से पार उतार देना. यह कह भक्त और भगवान दोनों के नेत्र सजल हो उठे एवं भगवान राम और माता सीता केवट को आशीर्वाद देते हुए आगे की यात्रा पर निकले…

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...