Wednesday, February 8, 2023

जब भगवान राम के बार-बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव...

जब भगवान राम के बार-बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव...


राम-केवट संवाद

नदी पार करने के लिए भगवान राम ने केवट से नांव मंगाई , केवट के चरण रज का हवाला देते हुए नांव ना लाने के लिए बोला जिसपर भगवान उसकी इच्छा समझ गए और फिर उपाय स्वरूप केवट ने राम जी के चरण धोए और उन्हें पार उतारा.

भगवान राम ने केवट से नांव मंगाई

केवट के चरण रज का हवाला देते हुए नांव ना लाने के लिए बोला

उपाय स्वरूप केवट ने राम जी के चरण धोए और उन्हें पार उतारा

भगवान श्री राम, भगवान होने के साथ साथ एक राजा भी थे और राजा के आदेश का पालन करना प्रजा का परमधर्म होता है परंतु क्या आप जानते हैं वह प्रसंग जब राम के बार बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव…? अगर नहीं! तो आइए हम बताते है आपको इस मार्मिक प्रसंग के बारे में. रामचरित्रमानस के अनुसार जब पिता दशरथ ने भगवान श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया तो भगवान श्री राम, भाई लक्ष्मण एवं पत्नी सीता के साथ अयोध्या छोड़ वन को चल दिए परंतु रास्ते में नदी पड़ती है जिसे पार करने के लिए श्री राम केवट को बुलाते हैं.

कौन थे केवट…?
रामचरित्रमानस में वर्णित सभी पात्रों की अपनी अलग ही महिमा है परंतु उन सभी श्रेष्ठ पात्रों में से कुछ सर्वश्रेष्ठ पात्र भी हैं जैसे केवट. केवट को कोई पूजा, पाठ, यज्ञ, होम आदि कुछ नहीं आता था, परंतु यह उनके मन की पवित्रता एवं पुण्यकर्मों का फल ही था जो भगवान श्री राम स्वय चलकर उनतक पहुंचे और फिर एक नदी के केवट ने भवसागर के केवट को नाव से गंगा के पार उतारा.

जब श्री राम ने मांगी केवट से नांव,
भगवान राम के नांव मांगने पर केवट ने उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारा और वह जान गया कि यही भगवान श्री राम ही हैं, परंतु उसने नांव लाने से मना कर दिया जिसपर भगवान श्री राम ने नांव ना लाने की वजह पूछी, केवट ने उत्तर दिया और बोला, “प्रभु मैं आपकी लीलाओं से अच्छी तरह अवगत हू, मैं जनता हू आपके चरणों की रज के जादू को जो एक पत्थर को सुंदर नारी बना सकता है. अगर आपकी जादू भरी पद रज एक पाषाण जैसी कठोर वस्तु को नारी बना सकती है तो यह तो मात्र लकड़ी से बनी नांव है इसका तो क्या ही हाल होगा…?”

जब केवट ने बताया उपाय,
यह सब सुन स्वभाव से उग्र लक्ष्मण जी क्रोधित हो केवट को डांटने-फटकार्ने लगे, जिसपर भगवान राम ने उन्हें शांत किया और मुस्कुराकर केवट से बोले, “केवटराज! कोई तो उपाय होगा जिससे हमें आप पार उतार सके…?”
यह सुन केवट बोले, “हे प्रभु! आपको नांव पर चढ़ाने के लिए पहले मुझे आपके चरणों को धोना पड़ेगा.”

केवट चाहते थे भगवान का चरणामृत पीना,
केवट के इन वचनो को सुनकर भगवान श्री राम उनकी इच्छा को समझ गए और हामी भरते हुए सीता एवं लक्ष्मण जी की ओर देखकर मुस्कुराने लगे. यह सुन केवट अत्यंत प्रसन्न हुए और उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे, वे जाकर एक पात्र में गंगाजल लाए और बड़े ही प्रेम से प्रभु के चरण कमल धोकर, चरणामृत का पान कर कृतार्थ हुए. प्रभु के चरणामृत से उन्होंने अपने पुरखो को भी तारा एवं खुद भी मोक्ष के अधिकारी भी बन गए.

केवट ने लगाया श्री राम, सीता और लक्ष्मण जी को पार,
इसके बाद केवट ने उन तीनो को नांव में विराजमान करा, प्रभु की रसमाधुरी का पान करते हुए उन्हे पार उतार दिया. पर उतरने के बाद केवट से प्रभु राम ने उतराई यानि नांव के किराए के बारे में पूछा जिसपर केवट मे व्याकुल हो कहा, “प्रभु मैंने आज आपको इस नदी से पार लगाया है, कल जब में आपके लोक में आऊगा तो कृपा कर आप मुझे भवसागर से पार उतार देना. यह कह भक्त और भगवान दोनों के नेत्र सजल हो उठे एवं भगवान राम और माता सीता केवट को आशीर्वाद देते हुए आगे की यात्रा पर निकले…

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