Tuesday, February 7, 2023

संत तुलसीदास एवं श्रीरामचरितमानस

 संत तुलसीदास एवं श्रीरामचरितमानस

श्री रामचरितमानस को समझने के लिए सर्वप्रथम अपने भीतर श्रद्धा होनी चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवत् गीता में अर्जुन को कहा है -

" श्रद्धावान लभते ज्ञानं " अर्थात् श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है।

श्रद्धा के पश्चात् भक्त तुलसीदास ने " संतन्ह कर साथ " पर जोर दिया है। संत पर चर्चा करने के पहले कुछ बातों का जानना अति आवश्यक है।

हममें से अनेक लोगों ने समुद्र को देखा होगा। समुद्र आकार में विशाल होता है तथा अथाह गहरा होता है। समुद्र का सारा जल खारा होता है , जो पीने योग्य नहीं होता। लेकिन उसी समुद्र के खारे जल से मेघ मीठा जल धरती पर बरसाता है।

तुलसीदास जी समुद्र एवं बादल को किस दृष्टि से देखते हैं ? इस पर वे लिखते हैं -

" वेद पुरान उदधि घन साधू" अर्थात् वेद - पुराण आदि ज्ञान के उदधि (सागर) हैं तथा साधु (संत) घन (बादल) के समान है।

कहने का तात्पर्य है कि वेद - पुराण - आरण्यक - उपनिषद आदि सभी ग्रंथ ज्ञान के अथाह सागर हैं। इनका अध्ययन कर समझ पाना सभी के लिए संभव नहीं है। संत सभी ग्रंथों का अध्ययन कर उसके सारतत्व को समाज के बीच में उसी प्रकार रखते हैं , जिस प्रकार मेघ सागर से खारे (नमकीन) जल को मीठे जल के रूप में परिवर्तित करते हैं।।

संतरूपी मेघ कैसा जल बरसाते हैं ? इस पर तुलसीदास जी लिखते हैं -

बरसहिं राम सुजस बर बारी ।

मधुर मनोहर मंगलकारी ।।

वे (संतरूपी मेघ) श्रीराम जी के सुयशरूपी सुंदर , मधुर मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं।

प्रेम भगति जो बरनि न जाई।

सोइ मधुरता सुसीतलताई।।

जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता , वही इस जल की मधुरता और सुंदर शीतलता है।

सो जल सुकृत सालि हित होई।

राम भगत जन जीवन होई।।

वह (राम-सुयशरूपी) जल सत्कर्मरूपी धान के लिए हितकर है और श्रीरामजी के भक्तों का तो जीवन ही है।

जब नारदजी प्रभु श्रीराम से संतो के लक्षण को जानना चाहते हैं , तब भगवान श्रीराम कहते हैं -

सुनु मुनि संतन्ह के गुण कहऊं ।

जिन्ह ते मैं उन्ह के बस रहऊं ।।

हे मुनि ! सुनो , मैं संतो के गुणों को कहता हूं , जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूं।

(अब हम समझ गए होंगे कि तुलसीदास जी संतों का संग करने के लिए क्यों कह रहे हैं ?)

संतो के गुणों का वर्णन करते हुए प्रभु श्रीराम कहते हैं -

श्रद्धा छमा मयत्री दाया ।

मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।

बिरति बिबेक बिनय बिज्ञाना।

बोध जथारथ बेद पुराना।।

उनमें (संतों में) श्रद्धा , क्षमा , मैत्री , दया , मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणों में निष्कपट प्रेम होता है तथा उन्हें वैराग्य , विवेक , विनय , विज्ञान (परमात्मा के तत्व का ज्ञान) और वेद - पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है।

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