Thursday, February 23, 2023

श्री हनुमान जी के बल का वर्णन

 श्री हनुमान जी के बल का वर्णन

वैसे तो हनुमान जी के बल का वर्णन मुख से नहीं किया जा सकता लेकिन हनुमान चालीसा कि यह लाइन श्री हनुमान जी के बल का वर्णन करती है

रामदूत अतुलित बल धामा

इस लाइन का अर्थ है कि हनुमानजी अतुलित बल अर्थात जिस बल का कोई सीमा नहीं है , अतुल्य बल के हनुमानजी स्वामी है

समुंद्र पार करते समय जब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई थी तब जिस पर्वत से हनुमान जी ने लंका जाने के लिए छलांग लगाई वह पर्वत हनुमान जी के बल से पाताल लोक में धस गया।

एक बार रावण वह हनुमान जी ने एक-एक मुक्के का युद्ध हुआ जिसमें यह शर्त रखी गई कि जिस के मुक्के में ज्यादा शक्ति होगी वह जीत जाएगा युद्ध शुरू हुआ हनुमान जी ने कहा पहले आप मारे तब रावण ने कहा नहीं पहले तुम मारो इस पर हनुमान जी ने कहा नहीं पहले आप मारे कहीं फिर आप अपनी बारी के लिए बचे ही ना तब रावण ने जोर से मुक्का बनाया और हनुमान जी की छाती पर मारा जिस पर हनुमान जी को कुछ भी नहीं हुआ व रावण को जोर से पीछे झटका लगा अब श्री हनुमान जी की बारी आई तो उन्होंने पूरी जोर से मुक्का बनाया और घुमा के जैसे ही मारने वाले थे वैसे ही ब्रह्मा जी आप वहां प्रकट हो गए और हनुमान जी को उन्होंने रोक लिया तब ब्रह्मा जी ने कहा की हनुमान जी आप इतना जोर से ना मारे वरना यह रावण यही मर जाएगा और यह युद्ध यहीं समाप्त हो जाएगा तब हनुमान जी ने बहुत थोड़ा सा बल लगा कर रावण को मारा उस पर भी रावण कई हफ्तों तक बिस्तर से नहीं उठा इस पर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हनुमानजी के अंदर कितना बल है और ऐसे बहुत सारे प्रसंग हैं जिनसे हनुमान जी के बल का हमें थोड़ा बहुत पता चलता है।

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’

 केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।

*पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।

बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम


Friday, February 17, 2023

कौन हैं पंजुरली और गुलिगा देव और क्या है भूता कोला? kaun hai panjurali dev?

कौन हैं पंजुरली और गुलिगा देव और क्या है भूता कोला?



आज कल "कांतारा" नामक एक फिल्म की बहुत चर्चा है और उससे भी अधिक उत्सुकता उस फिल्म में दिखाए गए देवता "पंजुरली देव" के बारे में जानने में है। पंजुरली देव की उपासना दक्षिण भारत, विशेषकर कर्णाटक और केरल के कुछ हिस्सों में की जाती है। वहां इनकी दंतकथाएं बड़ी प्रचलित हैं किन्तु देश के अन्य हिस्सों में उसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। तो आइये इस विषय में कुछ जानते हैं।

पंजुरली शब्द वास्तव में एक तुलु शब्द "पंजीदा कुर्ले" का अपभ्रंश है। तुलु भाषा में इसका अर्थ होता है "युवा वाराह"। ये कुछ कुछ भगवान विष्णु के वाराह अवतार की ही तरह है। तुलु लोगों में, जिन्हे तुलुनाडु भी कहा जाता है, पंजुरली देव सबसे प्राचीन देवताओं में से एक हैं। ऐसी मान्यता है कि जब पहली बार पृथ्वी पर अन्न की उत्पत्ति हुई उसी समय पंजुरली देव पृथ्वी पर आये, अर्थात मानव सभ्यता के आरम्भ में।

कुछ विद्वानों का ये भी मानना है कि जब मनुष्यों ने खेती करना सीखा तो उस समय जंगली सूअर (वाराह) अपने पेट भरने के लिए उनकी फसल को खा जाते थे। उन्होंने इसे कोई दैवीय शक्ति समझ लिया और वाराह रुपी पंजुरली देव की उपासना करना आरम्भ कर दिया ताकि वे उनकी फसलों की रक्षा करें। तब से ही पंजुरली देव की पूजा हो रही है।

आज भी पंजुरली देव की पूजा करते समय लोग "बरने-कोरपुनि" नामक एक प्रथा करते हैं जहाँ वे देवता को अन्न अर्पण करते हैं। इस प्रथा में बांस के एक पात्र में चावल रखते हैं और उस पर नारियल के दो टुकड़ों में दीपक को जला कर पंजुरली देवता के सामने रखते हैं।

इसके बाद पंजुरली देव के समक्ष एक बेहद प्राचीन नृत्य किया जाता है जिसे "भूता कोला" कहते हैं। कोला का अर्थ तुलु भाषा में नृत्य होता है और भूता इस नृत्य का एक प्रकार है। भूता कोला की भांति और भी कई प्रकार के नृत्य होते हैं। ये नृत्य बहुत देर तक चलता है और जब नृत्य करने वाला व्यक्ति थक जाता है तब लोग उस अन्न को पंजुरली देव को समर्पित करते हैं। ये एक प्रकार से उनसे अपनी फसलों की रक्षा के लिए की गयी प्रार्थना होती है।

पौराणिक कथा के अनुसार एक वाराह के पांच पुत्र हुए किन्तु उनमें से एक नवजात बच्चा पीछे छोट गया। वो भूख प्यास से तड़पने लगा और मृत्यु के कगार पर आ खड़ा हुआ। उसी समय माता पार्वती वहां भ्रमण करते हुए आयी। जब उन्होंने एक नवजात वाराह शिशु को देखा तो उन्हें उसपर दया आ गयी और वे उसे लेकर कैलाश आ गयी। वहां वो अपने पुत्र की भांति ही उसका पालन करने लगी।

समय बीता और उस बच्चे ने एक विकराल वाराह का रूप ले लिया। समय के साथ उसके दाढ़ (दांत) निकल आये जिससे उसे बड़ी परेशानी होने लगी। उस खुजलाहट से बचने के लिए वो पृथ्वी पर लगी सारी फसलों को नष्ट करने लगा। इससे संसार में भोजन की कमी हो गयी और लोग भूख से त्रस्त हो गए। जब भगवान शंकर ने ये देखा तो उन्होंने सृष्टि के कल्याण के लिए उस वाराह के वध का निश्चय किया।

जब माता पार्वती को ये पता चला तो उन्होंने महादेव से उसके प्राण ना लेने की प्रार्थना की। माता की प्रार्थना पर महादेव ने उसका वध तो नहीं किया किन्तु उसे कैलाश से निष्काषित कर पृथ्वी पर जाने का श्राप दे दिया। अपनी प्राण रक्षा के बाद उस वाराह ने महादेव और माता पार्वती की अभ्यर्थना की और तब भोलेनाथ ने उसे एक दिव्य शक्ति के रूप में पृथ्वी पर जाने और वहां पर मनुष्यों और उनकी फसलों की रक्षा करने का आदेश दिया।

तब से वो वाराह पृथ्वी पर "पंजुरली" देव के रूप में निवास करने लगे और पृथ्वी पर फसलों की रक्षा करने लगे। इसी कारण लोगों ने इन्हे देवता की भांति पूजना आरम्भ कर दिया। दक्षिण भारत में अलग-अलग स्थानों पर इन्हे अलग-अलग नाम से जाना जाता है। इनके नाम के साथ साथ इनकी पूजा पद्धति और रूप भी अलग-अलग हैं। अधिकतर स्थानों पर इन्हे वाराह के रूप में ही दिखाया जाता है किन्तु कुछ स्थानों पर इन्हे मुखौटा पहने हुए मनुष्य के रूप में भी दर्शाया जाता है।

इनकी एक बहन भी मानी गयी हैं जिनका नाम "कल्लूर्ति" है। इन दोनों का एक प्रसिद्ध मंदिर मैंगलोर के बंतवाल तालुका में है। ऐसी मान्यता है कि वहीँ पर कल्लूर्ति पंजुरली देव से मिलती है और इन दोनों की पूजा भाई बहन के रूप में की जाती है जिन्हे एक साथ "कल्लूर्ति-पंजुरली" देव के नाम से पूजा जाता है। तुलुनाडु में शायद ही ऐसा कोई परिवार हो जो कल्लूर्ति पंजुरली देव की पूजा ना करता हो।

कल्लूर्ति पंजुरली को सभी लोग अपने परिवार के मुखिया के रूप में मानते हैं। परिवार में कैसी भी समस्या हो उसे इन दोनों के समक्ष लाना होता है और वे दोनों ही उस समस्या का हल बताते हैं। हल कैसा भी हो, परिवार के सभी सदस्य को मानना होता है। ऐसी मान्यता है कि समस्या का हल ढूंढने में सुझाव कल्लूर्ति माँ देती है और अंतिम निर्णय पंजुरली देव का होता है।

पंजुरली देव के साथ-साथ एक और देवता "गुलिगा" का भी वर्णन आता है जो देवता का उग्र रूप हैं। प्राचीन कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती महादेव के लिए भस्म लायी। उस भस्म में एक कंकड़ था जिसे भोलेनाथ ने पृथ्वी पर फेंक दिया। उसी कंकड़ से गुलिगा देव अपने उग्र रूप में जन्में। उन्होंने महादेव से पूछा कि मैं कहा जाऊँ? इसपर भोलेनाथ ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया। भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी पर "नेनाउल्ला संके" के गर्भ में भेज दिया।

नौ मास के पश्चात गुलिगा देवा ने अपनी माँ से पूछा कि वो किस मार्ग से बाहर आये? उसकी माता ने कहा जिस मार्ग से सभी संतान आती है उसी मार्ग से आ जाओ पर गुलिगा देव ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपनी माता का उदर फाड़ डाला और उसी से बाहर निकले। वे अत्यंत भूखे थे इसीलिए वे कुछ खाने को ढूंढने लगे। उन्हें इतनी भूख लगी थी कि उन्होंने सूर्यदेव को खाने का प्रयास किया। फिर उन्होंने मछलियाँ खायी और जानवरों का खून पिया किन्तु इससे भी उनकी क्षुधा नहीं बुझी। अंततः भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी छोटी अंगुली खाने को दी जिससे उनकी क्षुधा शांत हुई।

गुलिगा देव को शिवगणों में से एक भी माना जाता है और इन्हे क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। एक कथा के अनुसार पंजुरली देव और गुलिगा देव में एक बार युद्ध हुआ जो बहुत दिन तक चला। तब माँ दुर्गा ने उस युद्ध को बंद करवाया और उन दोनों को एक साथ रहने की आज्ञा दी। इसी कारण आज भी पंजुरली देव और गुलिगा देव को एक साथ पूजा जाता है। जहाँ पंजुरली देव सौम्य स्वाभाव के हैं वही गुलिगा देव उग्र स्वभाव के किन्तु फिर भी ये दोनों शांति से एक साथ रहते हैं।

अब बात करते हैं प्रसिद्ध "भूता कोला" की। तुलु भाषा में भूता का अर्थ होता है दैवीय शक्ति और कोला का अर्थ होता है नृत्य। इसे दैवा कोला भी कहा जाता है। भूता कोला के साथ "दैवा नेमा" शब्द का प्रयोग भी होता है। ऐसी मान्यता है कि जहाँ भूता कोला में उस नृत्य का प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति पर एक आत्मा (भूत) प्रवेश करती है वहीँ जब नृत्यकर्ता पर कई आत्माओं (देव) का प्रभाव होता है तो उसे दैवा नेमा कहा जाता है।

भूता कोला का नृत्य पारम्परिक माना गया है। अर्थात ये कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। जो व्यक्ति भूता-कोला नृत्य में निपुण होता है वो अपने सबसे योग्य संतान को ही इसकी शिक्षा देता है और उसके बाद उसका वही बेटा भूता-कोला के नृत्य को करता है। इसके लिए उसे कठिन प्रशिक्षण लेना आवश्यक होता है। केवल वही व्यक्ति भूता कोला नृत्य को करने के योग्य माना जाता है जिसका मन पवित्र हो और जिसके शरीर में उस नृत्य के प्रदर्शन के समय देव या भूत प्रवेश कर सके।

पंजुरली देव और गुलिगा देव के अतिरिक्त भी कई अन्य देवों एवं देवियों का वर्णन आता है। इनमे से प्रमुख हैं - कल्लूर्ति, ब्रह्मेरु, कोडमणितया, कुक्किनतया, जुमाड़ी, सरला जुमाड़ी, पंच जुमाड़ी, लेक्केसीरी, कुप्पे पंजुरली, रक्त पंजुरली, जरनदया, उरनडरैय्या, होसादेवता, देवनजीरी, कलकुडा, तुक्कातेरी, बब्बरिया, नीचा, दुग्गलाया, महिसनदया, वर्ते, कोरागज्जा, चामुंडी, बैदेरुकुलु, उक्कातिरि, शिरादि, उल्लालथि, ओक्कुबल्लाला, कोरद्दब्बू, उल्लाया, कोराथी, सीरी, मंत्रीदेवाथे, रकतेश्वरी, इष्टदेवते, ओडीत्याय इत्यादि।

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...