Thursday, February 23, 2023

सोमनाथ मंदिर के रहस्य

 पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ, जानें इससे जुड़े 5 रोचक तथ्य


सोमनाथ मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने करवाया था.

12 में से सबसे पहले ज्योतिर्लिंग कहे जाने वाले सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में कई रोचक तथ्य पढ़ने को मिलते हैं, जिसके बारे सभी को जानना चाहिए. सोमनाथ मंदिर सौराष्ट्र के वेरावल बंदरगाह पर स्थित है. आइए जानते हैं इसका इतिहास और अन्य बातें.

हाइलाइट्स

भारतवर्ष में भगवान शिव के 12 तीर्थ स्थल हैं, जिन्हें 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है.

सोमनाथ मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने करवाया था.

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

भगवान शिव के बड़ी संख्या में भक्त हैं, जो उन्हें प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते रहते हैं. भारतवर्ष में भगवान शिव के 12 तीर्थ स्थल है जिन्हें 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है. 12 ज्योतिर्लिंग के विषय में रोचक तथ्य से जुड़ी एक सीरीज चलाई जा रही है, जिसमें अभी तक हम बात कर चुके हैं मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के महाकाल ज्योतिर्लिंग और खंडवा जिले के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में. आज की इस कड़ी में भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं पृथ्वी के सबसे पहले ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के बारे में.

1. मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने करवाया था. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का उल्लेख ऋग्वेद में भी पढ़ने को मिलता है. भोलेनाथ का यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान और पतन का प्रतीक भी माना जाता है.

2. भगवान शिव के इस मंदिर के शिखर की ऊंचाई 150 फीट है. जिस पर 10 टन वजनी कलश रखा है. सोमनाथ मंदिर की ध्वजा 27 फीट की है.

3. सोमनाथ मंदिर को तीन हिस्सों में बांटा गया है. पहला गर्भ ग्रह, दूसरा सभामंडप, तीसरा नृत्य मंडप. इस परिसर के ऊपरी भाग में शिवलिंग के ऊपर अहिल्येश्वर की प्रतिमा है. इसके अलावा यहां भगवान गणेश का मंदिर है, जिसके बाहर की तरफ उत्तरी भाग में अघोरलिंग की मूर्ति है. इस परिसर में देवी पार्वती, देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी, माता गंगा और नंदी की मूर्तियां स्थापित हैं.

4. मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण ने सोमनाथ में ही अपने शरीर का त्याग किया था. सोमनाथ मंदिर सुबह 6 बजे से रात में 9 बजे तक भक्तों के लिए खुला रहता है. इस दौरान भगवान शिव की एक दिन में तीन बार आरती की जाती है. पहली आरती सुबह 7 बजे, दूसरी आरती दोपहर 12 बजे और तीसरी आरती शाम 7 बजे की जाती है.

5. प्रभावनगर द्वार के पास एक गौरीकुंड सरोवर है, जिसके पास एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है. इसी प्रकार भावनगर में भगवान विष्णु, माता काली और भगवान गणेश के भव्य मंदिर बने हुए हैं.

जय श्री महाकाल।।🙏🏼🙏🏼🙏🏼

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अपनी_क्षमता_पहचानना_आवशयक

 अपनी_क्षमता_पहचानना_आवशयक है! 

एक गाँव में एक #आलसी आदमी रहता था, वह कुछ काम-धाम नहीं करता था।बस दिन भर #निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाए।एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया। वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे।रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और #आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया, लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का #मालिक वहाँ आ पहुँचा।

बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से #भाग खड़ा हुआ।भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा, वह बुरी तरह से थक गया था। इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा।तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी, उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी।लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ?

जिज्ञासा में वह  एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा, जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे, लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी, वह वहीं खड़ी रही।शेर लोमड़ी के पास आने लगा, आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा,लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था।

#शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया,उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था, जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया।

लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी, थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया।

यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि #भगवान सच में #सर्वेसर्वा है,उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए, चाहे वह जानवर हो या इंसान, खाने-पीने का  प्रबंध कर रखा है, वह अपने घर लौट आया।घर आकर वह २-३ दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था, वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी। आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा। घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े। वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है, लेकिन इंसानों के लिए नहीं।

बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है,भगवान के पास सारे प्रबंध है। दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी, लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें #लोमड़ी नहीं #शेर बनाना चाहते हैं।

#कहानी_में_निहित_शिक्षा

हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है,बस अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं।स्वयं की क्षमता पहचानिए। दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए।इतने सक्षम बनिए कि आप दूसरों की सहायता कर सकें।



💐ॐ नमो नारायण💐

 💎ॐ श्री विष्णुवे नमः💎

🌸ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌸

💮हे कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा💮

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग: यहां ब्रह्म हत्या जैसे पापों से मिलती है मुक्ति, जानें रोचक तथ्य

 रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग: यहां ब्रह्म हत्या जैसे पापों से मिलती है मुक्ति, जानें रोचक तथ्य

मंदिर के अंदर सभी कुएं भगवान राम ने अपने बाणों से बनाए थे.

भारत में जिस तरह काशी का महत्व उत्तर भारत में है, उसी प्रकार दक्षिण भारत में रामेश्वरम का महत्व है. रामेश्वरम हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों तरफ से घिरा हुआ एक शंख आकार का द्वीप है. आज हम जानेंगे रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में.

हाइलाइट्स

भगवान राम के नाम से ही इस जगह का नाम रामेश्वरम द्वीप और मंदिर का नाम रामेश्वरम पड़ा.

रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है.

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

भारत एक ऐसा देश है जहां कई तरह के ऐतिहासिक स्थल देखे जा सकते हैं और इन सभी का इतिहास में अपना अलग महत्व है. भारत में हजारों साल पुराने कई मंदिर स्थापित हैं, इसी क्रम में सबसे लुभावने और दर्शनार्थियों से भरे हुए मंदिरों में से एक है रामेश्वरम मंदिर. रामेश्वरम मंदिर एक हिंदू मंदिर है, जिसे भगवान शिव के सम्मान में बनाया गया है. ये मंदिर तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में स्थित है. इसे एक पवित्र स्थल और चार धामों में से एक माना गया है. इस मंदिर को स्थानीय भाषा में रामनाथ स्वामी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. इस विषय में बता रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

रामेश्वरम मंदिर का इतिहास
मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने लंका विजय की कामना से लंका जाने से पहले भगवान शिव की पूजा करना चाहते थे. तब उन्होंने इस जगह पर महादेव के शिवलिंग की स्थापना कर इसकी पूजा अर्चना की थी. भगवान राम के नाम से ही इस जगह का नाम रामेश्वरम द्वीप और मंदिर का नाम रामेश्वरम पड़ा. पुराणों के अनुसार, रावण एक ब्राह्मण था और ब्राह्मण को मारने के दोष को खत्म करने के लिए भगवान राम भगवान शिव की पूजा करना चाहते थे, लेकिन तब इस द्वीप पर कोई मंदिर नहीं था, इसलिए हनुमान जी को कैलाश पर्वत से भगवान शिव के शिवलिंग लाने के लिए कहा गया. जब हनुमान जी समय पर शिवलिंग लेकर नहीं पहुंच पाए, तब माता सीता ने समुद्र की रेत को मुट्ठी में उठाकर शिवलिंग का निर्माण किया और इसी शिवलिंग की भगवान राम ने पूजा की. हनुमान जी के द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी यहीं पर स्थापित कर दिया गया.

रामेश्वरम मंदिर के बारे में रोचक तथ्य
1. रामेश्वरम मंदिर लगभग 1000 फुट लंबा और 650 फुट चौड़ा है. इस मंदिर में 40 फुट ऊंचे दो पत्थर इतनी बराबरी के साथ लगाए गए हैं कि इनको देखकर आश्चर्य होना स्वभाविक है. मान्यताओं के अनुसार, रामेश्वर मंदिर निर्माण में लगाए हुए पत्थरों को श्रीलंका से नावों के जरिए लाया गया था.

2. रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है. यह उत्तर से दक्षिण में 197 मीटर और पूर्व पश्चिम में 133 मीटर लंबा है. इस गलियारे के परकोटे की चौड़ाई 6 मीटर और ऊंचाई 9 मीटर है. मंदिर में प्रवेश द्वार 38.4 मीटर ऊंचा है. यह मंदिर लगभग 6 हेक्टेयर में बना हुआ है.

3. रामेश्वरम में प्रचलित किवदंतियों की मानें तो इस मंदिर के अंदर सभी कुएं भगवान राम ने अपने बाणों से बनाए थे. ऐसा माना जाता है कि इनमें कई तीर्थ स्थलों का जल मिलाया गया था.

4. भगवान राम ने ब्राह्मण हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए यहां शिवलिंग की स्थापना कर उसकी पूजा की थी, इसलिए माना जाता है कि इस ज्योतिर्लिंग की विधि-विधान से पूजा करने से ब्रम्ह हत्या जैसे पापों से मुक्ति मिलती है. जो व्यक्ति यहां स्थित भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग पर पूरी श्रद्धा से गंगाजल चढ़ाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.

श्री हनुमान जी के बल का वर्णन

 श्री हनुमान जी के बल का वर्णन

वैसे तो हनुमान जी के बल का वर्णन मुख से नहीं किया जा सकता लेकिन हनुमान चालीसा कि यह लाइन श्री हनुमान जी के बल का वर्णन करती है

रामदूत अतुलित बल धामा

इस लाइन का अर्थ है कि हनुमानजी अतुलित बल अर्थात जिस बल का कोई सीमा नहीं है , अतुल्य बल के हनुमानजी स्वामी है

समुंद्र पार करते समय जब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई थी तब जिस पर्वत से हनुमान जी ने लंका जाने के लिए छलांग लगाई वह पर्वत हनुमान जी के बल से पाताल लोक में धस गया।

एक बार रावण वह हनुमान जी ने एक-एक मुक्के का युद्ध हुआ जिसमें यह शर्त रखी गई कि जिस के मुक्के में ज्यादा शक्ति होगी वह जीत जाएगा युद्ध शुरू हुआ हनुमान जी ने कहा पहले आप मारे तब रावण ने कहा नहीं पहले तुम मारो इस पर हनुमान जी ने कहा नहीं पहले आप मारे कहीं फिर आप अपनी बारी के लिए बचे ही ना तब रावण ने जोर से मुक्का बनाया और हनुमान जी की छाती पर मारा जिस पर हनुमान जी को कुछ भी नहीं हुआ व रावण को जोर से पीछे झटका लगा अब श्री हनुमान जी की बारी आई तो उन्होंने पूरी जोर से मुक्का बनाया और घुमा के जैसे ही मारने वाले थे वैसे ही ब्रह्मा जी आप वहां प्रकट हो गए और हनुमान जी को उन्होंने रोक लिया तब ब्रह्मा जी ने कहा की हनुमान जी आप इतना जोर से ना मारे वरना यह रावण यही मर जाएगा और यह युद्ध यहीं समाप्त हो जाएगा तब हनुमान जी ने बहुत थोड़ा सा बल लगा कर रावण को मारा उस पर भी रावण कई हफ्तों तक बिस्तर से नहीं उठा इस पर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हनुमानजी के अंदर कितना बल है और ऐसे बहुत सारे प्रसंग हैं जिनसे हनुमान जी के बल का हमें थोड़ा बहुत पता चलता है।

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’

 केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।

*पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।

बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम


Friday, February 17, 2023

कौन हैं पंजुरली और गुलिगा देव और क्या है भूता कोला? kaun hai panjurali dev?

कौन हैं पंजुरली और गुलिगा देव और क्या है भूता कोला?



आज कल "कांतारा" नामक एक फिल्म की बहुत चर्चा है और उससे भी अधिक उत्सुकता उस फिल्म में दिखाए गए देवता "पंजुरली देव" के बारे में जानने में है। पंजुरली देव की उपासना दक्षिण भारत, विशेषकर कर्णाटक और केरल के कुछ हिस्सों में की जाती है। वहां इनकी दंतकथाएं बड़ी प्रचलित हैं किन्तु देश के अन्य हिस्सों में उसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। तो आइये इस विषय में कुछ जानते हैं।

पंजुरली शब्द वास्तव में एक तुलु शब्द "पंजीदा कुर्ले" का अपभ्रंश है। तुलु भाषा में इसका अर्थ होता है "युवा वाराह"। ये कुछ कुछ भगवान विष्णु के वाराह अवतार की ही तरह है। तुलु लोगों में, जिन्हे तुलुनाडु भी कहा जाता है, पंजुरली देव सबसे प्राचीन देवताओं में से एक हैं। ऐसी मान्यता है कि जब पहली बार पृथ्वी पर अन्न की उत्पत्ति हुई उसी समय पंजुरली देव पृथ्वी पर आये, अर्थात मानव सभ्यता के आरम्भ में।

कुछ विद्वानों का ये भी मानना है कि जब मनुष्यों ने खेती करना सीखा तो उस समय जंगली सूअर (वाराह) अपने पेट भरने के लिए उनकी फसल को खा जाते थे। उन्होंने इसे कोई दैवीय शक्ति समझ लिया और वाराह रुपी पंजुरली देव की उपासना करना आरम्भ कर दिया ताकि वे उनकी फसलों की रक्षा करें। तब से ही पंजुरली देव की पूजा हो रही है।

आज भी पंजुरली देव की पूजा करते समय लोग "बरने-कोरपुनि" नामक एक प्रथा करते हैं जहाँ वे देवता को अन्न अर्पण करते हैं। इस प्रथा में बांस के एक पात्र में चावल रखते हैं और उस पर नारियल के दो टुकड़ों में दीपक को जला कर पंजुरली देवता के सामने रखते हैं।

इसके बाद पंजुरली देव के समक्ष एक बेहद प्राचीन नृत्य किया जाता है जिसे "भूता कोला" कहते हैं। कोला का अर्थ तुलु भाषा में नृत्य होता है और भूता इस नृत्य का एक प्रकार है। भूता कोला की भांति और भी कई प्रकार के नृत्य होते हैं। ये नृत्य बहुत देर तक चलता है और जब नृत्य करने वाला व्यक्ति थक जाता है तब लोग उस अन्न को पंजुरली देव को समर्पित करते हैं। ये एक प्रकार से उनसे अपनी फसलों की रक्षा के लिए की गयी प्रार्थना होती है।

पौराणिक कथा के अनुसार एक वाराह के पांच पुत्र हुए किन्तु उनमें से एक नवजात बच्चा पीछे छोट गया। वो भूख प्यास से तड़पने लगा और मृत्यु के कगार पर आ खड़ा हुआ। उसी समय माता पार्वती वहां भ्रमण करते हुए आयी। जब उन्होंने एक नवजात वाराह शिशु को देखा तो उन्हें उसपर दया आ गयी और वे उसे लेकर कैलाश आ गयी। वहां वो अपने पुत्र की भांति ही उसका पालन करने लगी।

समय बीता और उस बच्चे ने एक विकराल वाराह का रूप ले लिया। समय के साथ उसके दाढ़ (दांत) निकल आये जिससे उसे बड़ी परेशानी होने लगी। उस खुजलाहट से बचने के लिए वो पृथ्वी पर लगी सारी फसलों को नष्ट करने लगा। इससे संसार में भोजन की कमी हो गयी और लोग भूख से त्रस्त हो गए। जब भगवान शंकर ने ये देखा तो उन्होंने सृष्टि के कल्याण के लिए उस वाराह के वध का निश्चय किया।

जब माता पार्वती को ये पता चला तो उन्होंने महादेव से उसके प्राण ना लेने की प्रार्थना की। माता की प्रार्थना पर महादेव ने उसका वध तो नहीं किया किन्तु उसे कैलाश से निष्काषित कर पृथ्वी पर जाने का श्राप दे दिया। अपनी प्राण रक्षा के बाद उस वाराह ने महादेव और माता पार्वती की अभ्यर्थना की और तब भोलेनाथ ने उसे एक दिव्य शक्ति के रूप में पृथ्वी पर जाने और वहां पर मनुष्यों और उनकी फसलों की रक्षा करने का आदेश दिया।

तब से वो वाराह पृथ्वी पर "पंजुरली" देव के रूप में निवास करने लगे और पृथ्वी पर फसलों की रक्षा करने लगे। इसी कारण लोगों ने इन्हे देवता की भांति पूजना आरम्भ कर दिया। दक्षिण भारत में अलग-अलग स्थानों पर इन्हे अलग-अलग नाम से जाना जाता है। इनके नाम के साथ साथ इनकी पूजा पद्धति और रूप भी अलग-अलग हैं। अधिकतर स्थानों पर इन्हे वाराह के रूप में ही दिखाया जाता है किन्तु कुछ स्थानों पर इन्हे मुखौटा पहने हुए मनुष्य के रूप में भी दर्शाया जाता है।

इनकी एक बहन भी मानी गयी हैं जिनका नाम "कल्लूर्ति" है। इन दोनों का एक प्रसिद्ध मंदिर मैंगलोर के बंतवाल तालुका में है। ऐसी मान्यता है कि वहीँ पर कल्लूर्ति पंजुरली देव से मिलती है और इन दोनों की पूजा भाई बहन के रूप में की जाती है जिन्हे एक साथ "कल्लूर्ति-पंजुरली" देव के नाम से पूजा जाता है। तुलुनाडु में शायद ही ऐसा कोई परिवार हो जो कल्लूर्ति पंजुरली देव की पूजा ना करता हो।

कल्लूर्ति पंजुरली को सभी लोग अपने परिवार के मुखिया के रूप में मानते हैं। परिवार में कैसी भी समस्या हो उसे इन दोनों के समक्ष लाना होता है और वे दोनों ही उस समस्या का हल बताते हैं। हल कैसा भी हो, परिवार के सभी सदस्य को मानना होता है। ऐसी मान्यता है कि समस्या का हल ढूंढने में सुझाव कल्लूर्ति माँ देती है और अंतिम निर्णय पंजुरली देव का होता है।

पंजुरली देव के साथ-साथ एक और देवता "गुलिगा" का भी वर्णन आता है जो देवता का उग्र रूप हैं। प्राचीन कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती महादेव के लिए भस्म लायी। उस भस्म में एक कंकड़ था जिसे भोलेनाथ ने पृथ्वी पर फेंक दिया। उसी कंकड़ से गुलिगा देव अपने उग्र रूप में जन्में। उन्होंने महादेव से पूछा कि मैं कहा जाऊँ? इसपर भोलेनाथ ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया। भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी पर "नेनाउल्ला संके" के गर्भ में भेज दिया।

नौ मास के पश्चात गुलिगा देवा ने अपनी माँ से पूछा कि वो किस मार्ग से बाहर आये? उसकी माता ने कहा जिस मार्ग से सभी संतान आती है उसी मार्ग से आ जाओ पर गुलिगा देव ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपनी माता का उदर फाड़ डाला और उसी से बाहर निकले। वे अत्यंत भूखे थे इसीलिए वे कुछ खाने को ढूंढने लगे। उन्हें इतनी भूख लगी थी कि उन्होंने सूर्यदेव को खाने का प्रयास किया। फिर उन्होंने मछलियाँ खायी और जानवरों का खून पिया किन्तु इससे भी उनकी क्षुधा नहीं बुझी। अंततः भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी छोटी अंगुली खाने को दी जिससे उनकी क्षुधा शांत हुई।

गुलिगा देव को शिवगणों में से एक भी माना जाता है और इन्हे क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। एक कथा के अनुसार पंजुरली देव और गुलिगा देव में एक बार युद्ध हुआ जो बहुत दिन तक चला। तब माँ दुर्गा ने उस युद्ध को बंद करवाया और उन दोनों को एक साथ रहने की आज्ञा दी। इसी कारण आज भी पंजुरली देव और गुलिगा देव को एक साथ पूजा जाता है। जहाँ पंजुरली देव सौम्य स्वाभाव के हैं वही गुलिगा देव उग्र स्वभाव के किन्तु फिर भी ये दोनों शांति से एक साथ रहते हैं।

अब बात करते हैं प्रसिद्ध "भूता कोला" की। तुलु भाषा में भूता का अर्थ होता है दैवीय शक्ति और कोला का अर्थ होता है नृत्य। इसे दैवा कोला भी कहा जाता है। भूता कोला के साथ "दैवा नेमा" शब्द का प्रयोग भी होता है। ऐसी मान्यता है कि जहाँ भूता कोला में उस नृत्य का प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति पर एक आत्मा (भूत) प्रवेश करती है वहीँ जब नृत्यकर्ता पर कई आत्माओं (देव) का प्रभाव होता है तो उसे दैवा नेमा कहा जाता है।

भूता कोला का नृत्य पारम्परिक माना गया है। अर्थात ये कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। जो व्यक्ति भूता-कोला नृत्य में निपुण होता है वो अपने सबसे योग्य संतान को ही इसकी शिक्षा देता है और उसके बाद उसका वही बेटा भूता-कोला के नृत्य को करता है। इसके लिए उसे कठिन प्रशिक्षण लेना आवश्यक होता है। केवल वही व्यक्ति भूता कोला नृत्य को करने के योग्य माना जाता है जिसका मन पवित्र हो और जिसके शरीर में उस नृत्य के प्रदर्शन के समय देव या भूत प्रवेश कर सके।

पंजुरली देव और गुलिगा देव के अतिरिक्त भी कई अन्य देवों एवं देवियों का वर्णन आता है। इनमे से प्रमुख हैं - कल्लूर्ति, ब्रह्मेरु, कोडमणितया, कुक्किनतया, जुमाड़ी, सरला जुमाड़ी, पंच जुमाड़ी, लेक्केसीरी, कुप्पे पंजुरली, रक्त पंजुरली, जरनदया, उरनडरैय्या, होसादेवता, देवनजीरी, कलकुडा, तुक्कातेरी, बब्बरिया, नीचा, दुग्गलाया, महिसनदया, वर्ते, कोरागज्जा, चामुंडी, बैदेरुकुलु, उक्कातिरि, शिरादि, उल्लालथि, ओक्कुबल्लाला, कोरद्दब्बू, उल्लाया, कोराथी, सीरी, मंत्रीदेवाथे, रकतेश्वरी, इष्टदेवते, ओडीत्याय इत्यादि।

Thursday, February 16, 2023

महाशिवरात्रि का महत्व mahashivratri ka mahatva

 महाशिवरात्रि का महत्व



महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को, शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु, साधकों के लिए, यह वह दिन है, जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे। वे एक पर्वत की भाँति स्थिर व निश्चल हो गए थे। यौगिक परंपरा में, शिव को किसी देवता की तरह नहीं पूजा जाता। उन्हें आदि गुरु माना जाता है, पहले गुरु, जिनसे ज्ञान उपजा। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के पश्चात्, एक दिन वे पूर्ण रूप से स्थिर हो गए। वही दिन महाशिवरात्रि का था। उनके भीतर की सारी गतिविधियाँ शांत हुईं और वे पूरी तरह से स्थिर हुए, इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

इसके पीछे की कथाओं को छोड़ दें, तो यौगिक परंपराओं में इस दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक साधक के लिए बहुत सी संभावनाएँ मौजूद होती हैं। आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से होते हुए, आज उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ उन्होंने आपको प्रमाण दे दिया है कि आप जिसे भी जीवन के रूप में जानते हैं, पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं, जिसे आप ब्रह्माण्ड और तारामंडल के रूप में जानते हैं; वह सब केवल एक ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों-करोड़ों रूपों में प्रकट करती है। यह वैज्ञानिक तथ्य प्रत्येक योगी के लिए एक अनुभव से उपजा सत्य है। ‘योगी’ शब्द से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, जिसने अस्तित्व की एकात्मकता को जान लिया है। जब मैं कहता हूँ, ‘योग’, तो मैं किसी विशेष अभ्यास या तंत्र की बात नहीं कर रहा। इस असीम विस्तार को तथा अस्तित्व में एकात्म भाव को जानने की सारी चाह, योग है। महाशिवारात्रि की रात, व्यक्ति को इसी का अनुभव पाने का अवसर देती है।


शिवरात्रि – महीने का सबसे ज्यादा अँधेरे से भरा दिन

शिवरात्रि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिवस होता है। प्रत्येक माह शिवरात्रि का उत्सव तथा महाशिवरात्रि का उत्सव मनाना ऐसा लगता है मानो हम अंधकार का उत्सव मना रहे हों। कोई तर्कशील मन अंधकार को नकारते हुए, प्रकाश को सहज भाव से चुनना चाहेगा। परंतु शिव का शाब्दिक अर्थ ही यही है, ‘जो नहीं है’। ‘जो है’, वह अस्तित्व और सृजन है। ‘जो नहीं है’, वह शिव है। ‘जो नहीं है’, उसका अर्थ है, अगर आप अपनी आँखें खोल कर आसपास देखें और आपके पास सूक्ष्म दृष्टि है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे। अगर आपकी दृष्टि केवल विशाल वस्तुओं पर जाती है, तो आप देखेंगे कि विशालतम शून्य ही, अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है। कुछ ऐसे बिंदु, जिन्हें हम आकाशगंगा कहते हैं, वे तो दिखाई देते हैं, परंतु उन्हें थामे रहने वाली विशाल शून्यता सभी लोगों को दिखाई नहीं देती। इस विस्तार, इस असीम रिक्तता को ही शिव कहा जाता है। वर्तमान में, आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है। इसी संदर्भ में शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में, सदा दिव्यता की सर्वव्यापी प्रकृति की बात की जाती रही है। यदि हम इसे देखें, तो ऐसी एकमात्र चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है, ऐसी वस्तु जो हर स्थान पर उपस्थित हो सकती है, वह केवल अंधकार, शून्यता या रिक्तता ही है। सामान्यतः, जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं, तो हम उस दिव्य को प्रकाश के रूप में दर्शाते हैं। जब लोग अपने कल्याण से ऊपर उठ कर, अपने जीवन से परे जाने पर, विलीन होने पर ध्यान देते हैं और उनकी उपासना और साधना का उद्देश्य विलयन ही हो, तो हम सदा उनके लिए दिव्यता को अंधकार के रूप में परिभाषित करते हैं।


शिवरात्रि का महत्व

प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना है। प्रकाश शाश्वत नहीं है, यह सदा से एक सीमित संभावना है क्योंकि यह घट कर समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि इस ग्रह पर सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्त्रोत है। यहाँ तक कि आप हाथ से इसके प्रकाश को रोक कर भी, अंधेरे की परछाईं बना सकते हैं। परंतु अंधकार सर्वव्यापी है, यह हर जगह उपस्थित है। संसार के अपरिपक्व मस्तिष्कों ने सदा अंधकार को एक शैतान के रूप में चित्रित किया है। पर जब आप दिव्य शक्ति को सर्वव्यापी कहते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से इसे अंधकार कह रहे होते हैं, क्योंकि सिर्फ अंधकार सर्वव्यापी है। यह हर ओर है। इसे किसी के भी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश सदा किसी ऐसे स्त्रोत से आता है, जो स्वयं को जला रहा हो। इसका एक आरंभ व अंत होता है। यह सदा सीमित स्त्रोत से आता है। अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं, तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं। भारतीय संस्कृति में, सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ केवल आपको बचाने या आपकी बेहतरी के संदर्भ में नहीं थीं। सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ कहती हैं, “हे ईश्वर, मुझे नष्ट कर दो ताकि मैं आपके समान हो जाऊँ।“ तो जब हम शिवरात्रि कहते हैं जो कि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिन है, तो यह एक ऐसा अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को विसर्जित कर के, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करे, जो प्रत्येक मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।


महाशिवरात्रि – जागृति की रात

महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है, जब आप स्वयं को, हर मनुष्य के भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं, जो कि सारे सृजन का स्त्रोत है। एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी ओर वे सबसे अधिक करुणामयी भी हैं। वे बहुत ही उदार दाता हैं। यौगिक गाथाओं में वे, अनेक स्थानों पर महाकरुणामयी के रूप में सामने आते हैं। उनकी करुणा के रूप विलक्षण और अद्भुत रहे हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि 2019 कुछ ग्रहण करने के लिए भी एक विशेष रात्रि है। यह हमारी इच्छा तथा आशीर्वाद है कि आप इस रात में कम से कम एक क्षण के लिए उस असीम विस्तार का अनुभव करें, जिसे हम शिव कहते हैं। यह केवल एक नींद से जागते रहने की रात भर न रह जाए, यह आपके लिए जागरण की रात्रि होनी चाहिए, चेतना व जागरूकता से भरी एक रात!

Tuesday, February 14, 2023

भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग


भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

सनातन धर्म में भगवान शिव के अनेक भक्त हैं. जो अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए कई जतन करते हैं. भारत देश में 12 अलग-अलग जगहों पर 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई है. जो सनातन धर्म में विशेष महत्व रखते हैं. इन्हीं में से एक है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग. जिससे जुड़े कई रोचक तथ्य हैं.

हाइलाइट्स

भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर का पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

हिंदू धर्म में भगवान शिव पर आस्था रखने वाले सभी भक्तों के लिए भगवान भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंग का अपना एक अलग महत्व है. इन्हीं 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग. मान्यताओं के अनुसार इन 12 ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव ने स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिए थे. इसके बाद इन 12 जगहों में 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई. भारतवर्ष के इन सभी 12 ज्योतिर्लिंगों की अपनी अलग-अलग विशेषताएं हैं. इन सभी मंदिरों में सावन के महीने में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनके भक्तों की भारी भीड़ आती है.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे अंतिम ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है. आज हमें ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा बता रहे हैं घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में कुछ रोचक तथ्य.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी रोचक बातें

-भारतवर्ष के इतिहास से पता चलता है कि भगवान भोलेनाथ के इस मंदिर का पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था. इसके अलावा इस मंदिर से महज आधा किलोमीटर की दूरी पर एलोरा की विश्व प्रसिद्ध गुफाएं भी मौजूद है.

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से सुख और संतान की प्राप्ति होती है. इस मंदिर में तीन द्वार हैं और गर्भगृह के सामने एक बड़ा सा मंडप है. जिसे सभा मंडप कहा गया है. यह मंडप पाषाण स्तंभों पर आधारित है. इन स्तंभों पर सुंदर चित्रण और नक्काशी की हुई है. सभा मंडप में नंदी की मूर्ति भी स्थापित है.

हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार घुश्मा नामक युवती की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे यहां दर्शन दिए थे और संतान सुख का वरदान भी दिया था. माना जाता है कि यहां निसंतान जोड़ों की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है. भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है.

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के मंदिर का व्यास 240×185 फीट में बना हुआ है. मान्यताओं के अनुसार यह भारत का सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग भी माना गया है. इसके अलावा इस मंदिर में भगवान विष्णु के 10 अवतार का चित्रण भी मिलता है. मंदिर का मुख्य प्रांगण 24 दिनों में बनाया गया है. इन पदों पर प्राचीन समय के शिलालेख और हस्त नीतियां दिखाई पड़ती हैं. इस मंदिर का गर्भ ग्रह 17×17 फीट में फैला हुआ है और इसके सामने नंदीश्वर की मूर्ति भी विराजमान है.

ॐ नमः शिवाय।।🙏🏼🙏🏼✨✨

Monday, February 13, 2023

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी

 

श्री शैल पर्वत पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं मल्लिकार्जुन.

भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है. मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव एक लोटे जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं. आज की इस कड़ी में हम जानेंगे भगवान शिव के एक और ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन के बारे में.

हाइलाइट्स

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है.

यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है,

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

सनातन धर्म में भगवान शिव को मानने और उनकी आराधना करने वाले अनेक भक्त हैं. मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव की श्रद्धा भाव के साथ पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है. भारत वर्ष में भगवान शिव के मुख्य रूप से 12 ज्योतिर्लिंग हैं. जो देश के कोने-कोने में भव्य मंदिरों के रूप में स्थापित हैं. भगवान शिव के इन 12 ज्योतिर्लिंगों का अपना एक अलग महत्व है.

इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए भारतवर्ष के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं. इन्हीं ज्योतिर्लिंगों में से एक है मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग जिसके बारे में अधिक जानकारी दे रहे हैं ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का महत्व

-मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है. भारतवर्ष में इस ज्योतिर्लिंग को दक्षिण भारत का कैलाश भी कहा गया है, मान्यताओं के अनुसार इसके दर्शन मात्र से ही सभी लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं, हिंदू धर्म पुराणों में बताया गया है कि मल्लिका अर्जुन ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त रूप से दिव्य ज्योतियाँ विराजमान है.

हिंदू धर्म में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को बहुत ही पवित्र ज्योतिर्लिंग माना गया है. श्री शैल पर्वत पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. ऐसा माना जाता है कि इस पर्वत पर जो भी व्यक्ति भगवान भोलेनाथ की पूजा करता है उसे अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है और उसकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं.

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास उस पौराणिक हिंदू कथा से जुड़ा हुआ है जब भगवान शिव के दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश में इस बात की शर्त लगी कि उनमें से बड़ा कौन है. भगवान कार्तिकेय का मानना था कि वे भगवान गणेश से बड़े हैं. जबकि गणेश जी कहते थे कि वह कार्तिकेय से बड़े हैं. इस बात पर माता पार्वती और भगवान शिव ने कार्तिकेय और गणेश से कहा कि जो भी पृथ्वी की परिक्रमा लगाकर सबसे पहले हमारे पास आ जाएगा वही बड़ा होगा. इस बात को सुनकर कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल गए. लेकिन चूहे की सवारी करने वाले भगवान गणेश के लिए यह काम मुश्किल था भगवान गणेश बुद्धि के दाता माने जाते हैं. इसलिए उन्होंने अपनी बुद्धि का उपयोग किया और माता पार्वती और पिता शिव की सात बार परिक्रमा की इस तरह उन्हें पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल के अधिकारी बन गए.

जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा कर वापस आए तब यह सब देख कर चौक गए. गुस्से में विशाल पर्वत की ओर चल दिए कार्तिकी को मनाने के लिए माता पार्वती भी पर्वत पर पहुंची इसके बाद भगवान शिव ने वहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर अपने दर्शन दिए. तभी से शिव का यह ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ.

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Friday, February 10, 2023

भारत के नागा साधु

नागा साधु

बात ज्यादा पुरानी नहीं है अंग्रेजो के ज़माने में एक दंगा हुआ था श्री राम जन्मभूमि को ले लेकर और फैज़ाबाद की तरफ से मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था ।तब दंगे के बीच सबने देखा कि हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों से 6 फुट से ज्यादा ऊंचा विशालकाय नागा साधु हाथ मे तलवार लिए उतरा और दंगाई भीड़ पे अकेले टूट पड़ा और गाजर मूली की तरहः काटता हुआ फैज़ाबाद की तरफ निकल गया ।हनुमान गढ़ी में रहने वाले अन्य महंत पुजारी नागा भी हैरान रह गए क्योंकि किसी ने उस नागा साधु को न उस दिन के पहले देखा था न उस दिन

के बाद देखा ।लेकिन उस अकेले नागा ने ऐसी मार काट की थी कि फैज़ाबाद तक सड़क पे दंगाइयों की लाशें पड़ी थी और दंगा बंद हो गया था ।अयोध्या शहर के कोतवाल हनुमान जी और अयोध्या की सुरक्षा का जिम्मा उनके ऊपर है और जब अयोध्या पर संकट आता है तो वो किसी न किसी साधु रूप में आते है 16 दिसम्बर वाले दिन बाबरी ढांचे के चारो तरफ प्रशाशन ने कई स्तर की बैरिकेड लगाया हुआ था और कार सेवक अंदर नहीं जा पा रहे थे ।तभी एक नागा साधु एक सरकारी बस स्टार्ट कर के तेज़ी से बस ले कर बैरिकेड के एक के बाद एक स्तर तोड़ता हुआ अंदर घुसता गया ।उसके पीछे भीड़ घुस गई और वो नागा उस भीड़ में गायब हो गया ।ये घटना फ़ोटो और वीडियो में रिकॉर्ड हुई थी अखबारों में भी छपी लेकिन वो नागा कभी दुबारा नही दिखा लेकिन उसने ढांचा गिराने के लिए कारसेवकों के लिए रास्ता खोल दिया था प्रशाशन देखता रह गया और कुछ नही कर सका था ।अयोध्या में हनुमान जी का किला है हनुमान गढ़ी और देश भर के सभी प्रमुख हनुमान मंदिरों का मुख्यालय भी है l

जय जय श्री राम


Wednesday, February 8, 2023

राम सेतु कथा

 राम सेतु कथा

रामसेतु रामायण काल में लंका विजय के लिए बनाया गया था.

रामायण काल में लंका पर विजय के लिए नल और नील ने रामसेतु बनाया था. उनको श्राप मिला था, जिस कारण से पानी में फेंके गए पत्थर डूबते नहीं थे. उनको यह श्राप बचपन में मिला था. पढ़ें यह रोचक कथा.

रामेश्वरम स्थित रामसेतु रामायण काल में लंका विजय के लिए बनाया गया था.

इस सेतु के निर्माण में विश्वकर्मा के पुत्र नल व नील की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.

बचपन में मिला एक श्राप इनके लिए सेतु निर्माण में वरदान साबित हुआ था.

राम सेतु कथा

रामसेतु के बारे में तो सभी जानते हैं. रामायण काल में यह सेतु यानी पुल लंका विजय के लिए भगवान राम ने बनवाया था. इस सेतु के निर्माण में वानर नल व नील की अहम भूमिका रही थी, जिनके हाथ से छुए हुए पत्थरों पर भगवान राम का नाम लिखने पर वे समुद्र में नहीं डूबे और उसी वजह से राम सेतु बन पाया. क्या आप जानते हैं नल व नील के हाथ से ही ये सेतु क्यों बनवाया गया? शायद नहीं! ऐसे में आज हम आपको उस श्राप की कथा बताते हैं, जो रामसेतु निर्माण में वरदान साबित हुआ.

नल-नील के श्राप की कथा
पंडित रामचंद्र जोशी के अनुसार, नल और नील भगवान विश्वकर्मा के पुत्र थे. ये बचपन में स्वभाव से बहुत ही नटखट थे. इनका ज्यादातर समय ऋषियों के आश्रम में ही बीतता था. अपने बाल स्वभाव से वे ऋषियों को खूब परेशान करते. जब भी ऋषि- मुनि ध्यान व तप करते तो दोनों भाई चुपके से दबे पांव आकर उनकी मूर्ति व अन्य सामान पानी में फेंक देते. दोनों को बालक समझ व उन पर स्नेह होने के कारण ऋषि उन्हें कभी कुछ नहीं कहते. इसी वजह से उनका उपद्रव लगातार बढ़ता ही गया.

ऋषियों का यही श्राप रामसेतु के निर्माण के समय वरदान साबित हुआ. जब लंका विजय के लिए समुद्र पार करना जरूरी हुआ तब भगवान राम ने समुद्र देव का आह्वान किया था. तब समुद्र ने प्रगट होकर नल-नील के शाप का जिक्र करते हुए सेतु का उपाय सुझाया. इसके बाद वानर सेना की सहायता से नल व नील ने पत्थरों पर भगवान राम का नाम लिखकर उनसे लंका तक सेतु बना दिया. यही सेतु रामसेतु कहलाता है.

जब भगवान राम के बार-बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव...

जब भगवान राम के बार-बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव...


राम-केवट संवाद

नदी पार करने के लिए भगवान राम ने केवट से नांव मंगाई , केवट के चरण रज का हवाला देते हुए नांव ना लाने के लिए बोला जिसपर भगवान उसकी इच्छा समझ गए और फिर उपाय स्वरूप केवट ने राम जी के चरण धोए और उन्हें पार उतारा.

भगवान राम ने केवट से नांव मंगाई

केवट के चरण रज का हवाला देते हुए नांव ना लाने के लिए बोला

उपाय स्वरूप केवट ने राम जी के चरण धोए और उन्हें पार उतारा

भगवान श्री राम, भगवान होने के साथ साथ एक राजा भी थे और राजा के आदेश का पालन करना प्रजा का परमधर्म होता है परंतु क्या आप जानते हैं वह प्रसंग जब राम के बार बार कहने पर भी केवट नहीं लाए नाव…? अगर नहीं! तो आइए हम बताते है आपको इस मार्मिक प्रसंग के बारे में. रामचरित्रमानस के अनुसार जब पिता दशरथ ने भगवान श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया तो भगवान श्री राम, भाई लक्ष्मण एवं पत्नी सीता के साथ अयोध्या छोड़ वन को चल दिए परंतु रास्ते में नदी पड़ती है जिसे पार करने के लिए श्री राम केवट को बुलाते हैं.

कौन थे केवट…?
रामचरित्रमानस में वर्णित सभी पात्रों की अपनी अलग ही महिमा है परंतु उन सभी श्रेष्ठ पात्रों में से कुछ सर्वश्रेष्ठ पात्र भी हैं जैसे केवट. केवट को कोई पूजा, पाठ, यज्ञ, होम आदि कुछ नहीं आता था, परंतु यह उनके मन की पवित्रता एवं पुण्यकर्मों का फल ही था जो भगवान श्री राम स्वय चलकर उनतक पहुंचे और फिर एक नदी के केवट ने भवसागर के केवट को नाव से गंगा के पार उतारा.

जब श्री राम ने मांगी केवट से नांव,
भगवान राम के नांव मांगने पर केवट ने उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारा और वह जान गया कि यही भगवान श्री राम ही हैं, परंतु उसने नांव लाने से मना कर दिया जिसपर भगवान श्री राम ने नांव ना लाने की वजह पूछी, केवट ने उत्तर दिया और बोला, “प्रभु मैं आपकी लीलाओं से अच्छी तरह अवगत हू, मैं जनता हू आपके चरणों की रज के जादू को जो एक पत्थर को सुंदर नारी बना सकता है. अगर आपकी जादू भरी पद रज एक पाषाण जैसी कठोर वस्तु को नारी बना सकती है तो यह तो मात्र लकड़ी से बनी नांव है इसका तो क्या ही हाल होगा…?”

जब केवट ने बताया उपाय,
यह सब सुन स्वभाव से उग्र लक्ष्मण जी क्रोधित हो केवट को डांटने-फटकार्ने लगे, जिसपर भगवान राम ने उन्हें शांत किया और मुस्कुराकर केवट से बोले, “केवटराज! कोई तो उपाय होगा जिससे हमें आप पार उतार सके…?”
यह सुन केवट बोले, “हे प्रभु! आपको नांव पर चढ़ाने के लिए पहले मुझे आपके चरणों को धोना पड़ेगा.”

केवट चाहते थे भगवान का चरणामृत पीना,
केवट के इन वचनो को सुनकर भगवान श्री राम उनकी इच्छा को समझ गए और हामी भरते हुए सीता एवं लक्ष्मण जी की ओर देखकर मुस्कुराने लगे. यह सुन केवट अत्यंत प्रसन्न हुए और उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे, वे जाकर एक पात्र में गंगाजल लाए और बड़े ही प्रेम से प्रभु के चरण कमल धोकर, चरणामृत का पान कर कृतार्थ हुए. प्रभु के चरणामृत से उन्होंने अपने पुरखो को भी तारा एवं खुद भी मोक्ष के अधिकारी भी बन गए.

केवट ने लगाया श्री राम, सीता और लक्ष्मण जी को पार,
इसके बाद केवट ने उन तीनो को नांव में विराजमान करा, प्रभु की रसमाधुरी का पान करते हुए उन्हे पार उतार दिया. पर उतरने के बाद केवट से प्रभु राम ने उतराई यानि नांव के किराए के बारे में पूछा जिसपर केवट मे व्याकुल हो कहा, “प्रभु मैंने आज आपको इस नदी से पार लगाया है, कल जब में आपके लोक में आऊगा तो कृपा कर आप मुझे भवसागर से पार उतार देना. यह कह भक्त और भगवान दोनों के नेत्र सजल हो उठे एवं भगवान राम और माता सीता केवट को आशीर्वाद देते हुए आगे की यात्रा पर निकले…

लंका_दहन

 🔥लंका_दहन 🔥     जब रावण की लंका दहन की बात होती है तो सबसे पहले हनुमान जी का नाम आता है ! लेकिन इस बात की जानकारी अब तक किसी को नहीं होगी...